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पशु क्रान्ति

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प्रस्तावना

नेपोलियन के शब्दो में कहें तो इतिहास लोगों की सहमती से लिखा गया झूठ का पिटारा है। ऐसे ही इतिहास को हम पढ़ते हैं, समझते हैं और अपना आदर्श बनाते हैं। जरुरत हैं हमें इसे दोबारा लिखने की, बिना किसी भेदभाव के।
मनुष्यों में गुलाम बनाने की प्रवृती आज की नही, शायद तब की है जब से उसमें संस्कृती का विकाश हुआ। उसने पहले तो जानवरों को और फिर अपने लोगों को ही अपना गुलाम बनाया। ये प्रवृती और फलती-फूलती गई जब हमनें हत्यारों को महान् होने की संज्ञा देनी शुरु की। अगर एक व्यक्ति की हत्या कर उसकी सम्पत्ती पर कब्जा करना पाप है, गलत है, गुनाह है, हत्या है। तो किसी देश को जीत कर लाखों जानों को लेने वाला, उसकी सम्पत्ती लूटने वाला किस तरह से पापी, हत्यारा व गलत न होकर महान् हो जाता है। ये प्रवृत्ती रुकती अगर हमने शुरु में ही सिकन्दर को महान् सिकन्दर न कहकर हत्यारा सिकन्दर कहा होता। मगर हुआ इसका उल्टा। हजारों साल हमने लोगों को लूटा, खसोटा, मारा पर फिर कुछ बुद्धि आई और मनुष्यों पर होने वाले अत्याचार की निंदा की गई। भले ही मनुष्य उससे पूर्णतः मुक्त न हुआ हो पर इस प्रवृती पर काफी हद तक अंकुश अवश्य लग गया है। हाँलाकि ये तब हुआ जब उसने अपने ऊपर ही इन प्रवृतियों की उपज से होने वाले दर्द को सहा, पर आज भी पशुओं के प्रति हमारी सोच में कोई बदलाव नही है। वो बोल नही सकते, स्वयं को व्यक्त नही कर सकते तो उनका दर्द, उनका कष्ट न हमें दिखाई देता है न सुनाई।
इस कहानी के माध्यम से मैने पशुओं के प्रति मनुष्यों में सहानभूति भरे सोच को पैदा करने की कोशिश की है। वैसे तो ये पूरी कहानी काल्पनिक धरातल पर लिखी गई है। पर इस कहानी के प्रथम भाग को ज्यादा से ज्यादा तार्किक व नैसर्गिक रखने की कोशिश की है तो दूसरे भाग में कल्पनाओं को पूरी छूट दी है। उम्मीद है आइने में खुद को उल्टा करके देखने पर मनुष्य को अपने गिरेबान में झांकने का एक मौका मिले।
सधन्यवाद् !

प्रथम खण्ड

“हत्या करना पाप है, लेकिन माँस खाने की छूट है। यदि कोई व्यक्ति किसी व्यक्ति की हत्या करे तो उसके लिए सजा है, लेकिन किसी जानवर का वध करे तो उसके लिए कोई सजा नही। आदमी को दास बनाकर रखना व बेचना गुनाह है, लेकिन जानवरों को गुलाम बनाकर रखना और बेचना गुनाह नही। इन्सान का घर कोई नष्ट कर दे तो वो गलत है, लेकिन इन्सानों ने जंगलो को काटकर जानवरों के घर नष्ट किए वो गलत नही है।
क्या गलत है और क्या सही, इसका निर्धारण मनुष्य ने केवल इस बात से किया है कि क्या उसके लिए फायदेमंद है और क्या उसके लिए नुकसानदेय। वास्तव में क्या गलत है और क्या सही उससे उसका कोई सरोकार नही रहा है। मनुष्य शक्तिशाली है, इसलिए शोषक भी वही है और शासक भी वही, वादी भी वही है और प्रतिवादी भी वही और न्यायाधीश बनकर न्याय भी उसने पक्षपात पूर्ण ही किया है। लेकिन कहते हैं, एकता मे शक्ति होती है। तो जब यही शोषित वर्ग एक हो जाएगा तो, क्या वो मनुष्य को छोड़ देगा?”
नहीं……………………नहीं……………………….कभी नहीं…………………..।

ये एक काल्पनिक समय की बात है।

मध्य अफ्रीका के बीहड़तम घने वर्षावनों में विश्व भर के पशुओं के सम्राट शेर जो बब्बर शेरों की प्रजाति के थे व जिन्हे पशु, सम्राट “मदीबा” के नाम से जानते थे, रहा करते थे। ये जंगल इतना घना था कि मीलों तक बड़े-बड़े घने पेड़ो, पत्तियों और उनकी डालियों के अलावा कुछ भी दिखाई नही देता था। लगातार होने वाली बारिश और उसके बाद की कड़क धूप ने इन वर्षा वनों को इतना घना बना दिया था कि खड़ी दोपहर में भी छन-छन कर सूरज की किरणें ब-मुश्किल ही जमीन तक पहुँच पाती थी। सूरज भी यहाँ स्वयं को शक्तिहीन समझता था। मनुष्यों के आधुनिक युग में भी ये जंगल पशुओं के लिए स्वर्ग थे। इस प्रकार के पशुओं के स्वर्ग, प्राचीनता की ये धरोहर, पौराणिकता की इस तरह की निशानियाँ विश्व में मनुष्यों के अतिक्रमण के बाद इक्का- दुक्का ही बचे थे।
शेर, चीता, बाघ, तेंदुआ, जगुआर, लंगूर, हुक्कू बन्दर, गोरिल्ला, चिम्पैजीं, गिब्बन, ओरंगउटांग, लोमड़ी, लकड़बघ्घा, भेडि़या, जंगली कुत्ते, वोल्वराइन, मिंक, नेवले, छछूंदर, चूहे, घोड़े, गधे, खच्चर, जेब्रा, जिराफ, ऊँट, गैण्डे, हिप्पोपोटैमस, सूअर, भेड़, गाय, बैल, भैंस, हिरन, मृग, बारहसिंहा, चमगादड़, भालू, हाथी, खरगोश, गिलहरी, अजगर, अनाकोण्डा, कोबरा जैसे अनेको साँप, बिच्छू, गोजर, सेन्टीपीड, सेही जैसे नाना प्रकार के जानवर यहाँ रहा करते थे। हर किस्म के जानवर, जानवरों की लगभग हर प्रजाति के कुछ जानवर इस जंगल में अवश्य मौजूद थे। ये जंगली जानवर इतने खूंख्वार थे कि शातिर से शातिर शिकारी भी यहाँ आने में डरते थे। आधुनिक युग में भी जब कि मनुष्य अपनी पहुँच अन्य ग्र्रहो तक बढ़ा रहा था, यहाँ जंगली जानवरों का ही राज था। उपर से देखने मे इस जंगल में मीलो तक फैली हरियाली, केवल पेड़ो की पत्तियाँ ही पत्तियाँ दिखाई देती थीं। यहाँ की जमीन भी सूखी पेड़ों की पत्तियों से ढकी पड़ी थी। बाहर से देखने में ये जंगल बड़ा ही गम्भीर व शांत दिखाई दे रहा था। पर क्या वास्तव में भी वो इतना शान्त था?
ये शान्ति थी तूफान के आने से पहले की, ये शान्ति थी पशुओं के दिलों में धधकते उस ज्वालामुखी के लावे की जो फूट पड़ने को बेकरार था। ये ऊपर से दिखाई देने वाली शान्ति आज इसलिए थी क्योकिं पशुओं के दिलों में मनुष्यों के प्रति भड़कती आग को आज हवा मिल गई थी। पशु सम्राट शेर मदीबा ने आज विश्व भर से जानवरों की एक सभा बुला रखी थी।
सारे जंगल के सभी जानवर एक गम्भीर मसले पर विचार-विमर्श करने के लिए इसी घने जंगल में स्थित पशु सम्राट मदीबा की मांद के पास एकत्रित हुए थे। सम्राट मदीबा की मांद इस घने जंगल के बीच कुछ ऊँची खड़ी चट्टानों के बीच बनी एक गुफा में थी। इस प्राकृतिक गुफा के पीछे कुछ ऊँची पहाडि़याँ थीं। ये गुफा उन्ही पहाडि़यो में अन्दर ही अन्दर फैली हुई थी। ये गुफा अन्दर से इतनी बड़ी थी, कि सम्राट गुफा के मार्ग से ही जंगल के एक बहुत बड़े क्षेत्र तक कहीं भी पहुँच सकते थे। गुफा के पीछे पहाडि़यों से एक झरना गिरता था, जो सम्राट की मांद के नीचे समतल पर आकर एक संकरी नदी का निर्माण करता था। साधारणतः एक चट्टान से दूसरे चट्टान पर से होकर सम्राट की मांद तक पहुँचना मुश्किल था क्योकिं ये नुकीली चट्टाने थीं। इन चट्टानों के अगल-बगल काफी बड़े व घने पेड़ मौजूद थे। इन पेड़ों ने इन चट्टानों को पूरी तरह से ढक रखा था। जंगल को ऊपर से देखने पर इन चट्टानों व इसमें बनी मांद को देखा नही जा सकता था। चट्टान पर बनी गुफा के पीछे एक बहुत प्राचीन लगभग २०० वर्ष पुराना वट वृक्ष था। इस वट वृक्ष की सैकड़ों शाखाएं थी, जो पूरे गुफा को घेरे हुए थीं। गुफा के आगे लम्बी समतल चट्टान थी जो आगे की तरफ नुकीली थी। सम्राट प्रायः इस स्थान से ही जंगल को सम्बोधित करते थे, और आज भी पशुओं की सभा को उनको यहीं से सम्बोधित करना था। इस समतल चट्टान के दायीं ओर लोमड़ी और बायीं ओर एक कौआ विराजमान था। दायीं ओर बैठी लोमड़ी का नाम “फॉली” था। फॉली दक्षिणी अमेरिकन प्रजाति की रेड फॉक्स थी व अपनी बुद्धिमत्ता व चालाकी के कारण इस पद तक पहुँच सकी थी। बायीं ओर बैठे कौए का नाम “कार्वी” था, जो सम्राट की गुप्तचर सेना का मुखिया था।
जंगल में मौजूद सभी जानवर, कीड़े-मकोड़े, कीट-पतंगे, उड़ने वाले पक्षी, सरीसृप, जलचर व उभयचर इस सभा में मौजूद थे। विश्व भर के जंगलों से, शहरों से, दूर-दूर से जो भी जानवर इस सभा में भाग लेने का इच्छुक था वो यहाँ मौजूद था। विश्व के लगभग सभी प्रजातियो के जानवरों के साथ दुर्लभ जानवर जैसे सफेद शेर, काला चीता, मगृ, रेण्डियर, याक, कंगारु, इत्यादि न जाने कितने ही जानवर यहाँ तक कि विश्व की अति दुर्लभ प्रजातियो के जानवर जैसे लिन्क्स, पाùण्डा, वोल्वराइन, अमेरिकन मिंक यहाँ तक की ब्लैक और स्नो लेपर्ड जैसे जानवर भी इस सभा में भाग लेने के लिए विश्व के कोने-कोने से यहाँ आए थे। इसी प्रकार चील, बाज, गिद्ध, कौआ, कोयल, तोता, मैना, टकाउ, रॉबिन, हमिंग बर्ड, किगंफिशर, गीस, फ्लेमिगों, हंस, कबूतर, गौरैया, बगुला, बतख, बटेर, सारस, बुलबुल, उल्लू, मुर्गी, मोर, टर्की, किवी, कठफोड़वा, हेरोन, शुतरमुर्ग जैसे अनेको पक्षी भी इस सभा में मौजूद थे। जहाँ जानवरों ने जमीन पर, तो पक्षियों ने पेड़ो की डालियों व टहनियों पर अपना आसन ग्रहण कर रखा था। छिपकली, साँप, गिरगिटान जैसे सरीसृप व अनेकों प्रकार के रेंगने वाले कीड़े-मकोड़े व कीट-पतंगे पेड़ो के तनों व पत्तियों से चिपके हुए थे। सारा वातावरण बिल्कुल शान्त व गम्भीर बना हुआ था। मोटे-मोटे तनो के घने पेड़ो के बीच जिस जानवर को जहाँ जगह मिल गयी थी, बैठा हुआ था। उनके प्रतिनिधि आगे की तरफ उपस्थित थे और उनके पीछे था, जानवरो का विशाल समुदाय जो मीलों तक फैला हुआ दिखाई दे रहा था।
पक्षी व पेड़ पर चढ़ सकने वाले जानवर जैसे बिल्ली, बन्दर, चीता पेड़ो की घनी पत्तियो, व उनकी टहनियो पर, शाखाओ पर लदे हुए थे। कुछ शाखाएं तो इनके भार से बोझिल हो इतनी झुक गई थीं, कि वो जमीन को छू रहीं थीं। पहाड़ी और जमीन के बीच बहने वाली संकरी नदी के पानी मे उपस्थित मछलियाँ भी अपना प्रतिनिधित्च इस सभा मे दे रहीं थीं। समुद्री मछलियो का तो वहाँ आना सम्भव न हो सका था परन्तु उनका प्रतिनिधित्व एक डाल्फिन मछली कर रही थी। इन मछलियों के साथ-साथ मगरमच्छ, घडि़याल व नदी में रहने वाली मछलियाँ व उभयचर जैसे मेंढ़क, कछुओं इत्यादि भी काफी संख्या मे वहाँ उपस्थित थे। सबसे बड़ी संख्या मे जिनकी मौजूदगी इस सभा में नजर आ रही थी, वो थी कीट पतंगो, मच्छरों व कीड़े- मकोड़ो की। सभी पेड़ो के तनो, उनकी पत्तियों टहनियो पेड़ों से लिपटी बेलों व जमीन से चिपके हुए उन्हे देखा जा सकता था। पशुओं-पक्षियों में कोई बँटवारा नही था, जिसको जहाँ जगह मिल गई थी और जो जहाँ रहने के अनूकूल था जैसे पानी के जानवर पानी में, जमीन के जमीन पर व पक्षी पेड़ो पर, वहीं बैठ गया था। यहाँ तक की काफी पक्षी तो जमीन पर बैठे पशुओं जैसे सूअर, भैंस, गधे इत्यादि के ऊपर भी बैठे हुए थे। सब एक दूसरे में गुंथे हुए थे। मकसद एक ही था कि वो अपने सम्राट की बात को ध्यान से सुन सकें। ज्यादा से ज्यादा जानवर सम्राट के करीब होना चाहते थे। इसलिए वो करीब-करीब ही बैठे थे।
पानी के बहने की कल-कल को छोड़कर किसी की भी आवाज नही आ रही थी। न पशुओ की, न पक्षियो की और न ही कीट-पतंगो की। सब शान्ति से बैठे अपने नेता का इन्तजार कर रहे थे। सभी पशुओ के प्रतिनिधि आगे की ओर बैठे हुए थे। सभी कि निगाहें और कान चट्टान पर बने अपने सम्राट शेर मदीबा के आसन की तरफ मुखातिब थे। अभी तक सम्राट का आगमन नही हुआ था। लम्बे इंतजार के बाद सम्राट का पदार्पण मंच पर हुआ। जब सम्राट अपनी मांद से निकलकर आये, तो सभी पशु उनके सम्मान में खड़े हो गये। सम्राट ने सभी को इशारे से बैठे रहने का संकेत दिया और स्वयं आकर अपने सिहांसन पर विराजमान हो गये। लोमड़ी ने सभी का स्वागत कर सभा की कार्यवाई आरम्भ की।
सम्राट का व्यक्तित्व धीर-गम्भीर प्रवृति का था। जब सम्राट गरजते थे, तो ५ मील दूर तक उनकी आवाज पहुँचती थी। पशु सिकुड़-सिकुड़ के बैठने के बाद भी मीलों तक फैले हुए थे। परन्तु इस शान्ति में पशु सम्राट की ध्वनि इतनी स्पष्ट सुनाई देती थी, कि पीछे की ओर बैठे जानवर भी सम्राट की आवाज को सुन सकते थे। सम्राट ने कहना शुरु किया-
“मेरे घरेलू व जंगली पशु साथियों।” सबसे पहले मै यहाँ उपस्थित सभी जानवरो व उनके प्रतिनिधियो का हार्दिक स्वागत करता हूँ। मुझे अत्यधिक खुशी व संतुष्टि है कि मेरे कहने पर आप इतनी बडी संख्या मे यहाँ उपस्थित हुए हैं। इनमे से कई पशु व पक्षी अनेको देशो से और बहुत दूर-दूर की यात्रा करके यहाँ पहुँचे हैं, उनका मै विशेष आभार प्रकट करना चाहूंगा। मैने यहाँ आप लोगो को एक अत्यन्त गम्भीर व महत्वपूर्ण मसले पर विचार विमर्श के लिए बुलाया है।
हम लोग जंगल मे रहते है और जंगल के कानून को मानते हैं। किसी अन्य जानवर का वध करना हमारी मजबूरी है। लेकिन मनुष्य ने हमारा वध कई बार सिर्फ शौक के लिए किया है, बिना अपनी किसी मजबूरी के किया है तथा उस हद तक किया है कि हममे से कई जानवर का अस्तित्व ही मिट गया, और कई का अस्तित्च खतरे मे आ गया है। कभी मनुष्य भी हम जानवरो मे से एक था, आज वो हमसे अलग हो गया है और अपने स्वार्थ मे लीन हो गया है। वो थोडी सी बुद्धि पाकर अपने आप को हमसे अलग समझने लगा है, और अपने आगे हमारे अस्तित्व को नष्ट करने पर तुला हुआ है। हमारे रहने के स्थान इतने छोटे कर दिये गये है, कि हमें रहने-खाने की तंगी हो गयी है। उसने हमारे रहने के स्थान पर भी कब्जा जमा लिया है व हमारे जंगलो को वो नष्ट करता जा रहा है और अपने कंकरीट के जंगलो को तैयार करता जा रहा है। मनुष्य हमारा व प्रकृति का उपयोग न करके उनका दोहन कर रहा है। हमें वो तुच्छ समझता है और हमसे गुलामो की तरह व्यवहार करता है। हममें से प्रत्येक जानवर का प्रयोग मनुष्य ने केवल अपने स्वार्थ के लिए किया है। अपनी जरा सी खुशी के लिए उसने हमारी पूरी जिन्दगी की स्वतंत्रता का हरण किया है। वो हमे पिंजरे तक मे बंद करके रखता है। अपने अनुसार ढालने के लिए उसने हम पर अनेको जुल्म किये है। सर्कसों मे हजारों जानवर उनके इशारो पर नाचने के लिए मजबूर है। मनुष्य प्रयोगो के नाम पर हमारी जिन्दगी से खिलवाड़ करता है। मेढंक, बंदर जैसे कितने ही जानवर रोज उनकी प्रयोगशालाओ मे काटे जाते है। वो अपनी जनसंख्या को नही रोकते बल्कि अपने भोजन के लिए हमारे माँसो का प्रयोग करते है। छोटी-छोटी बच्ची सी मछलियाँ उनका शिकार होती हैं। बकरियों के बच्चे, गायो के बच्चे उनके माता पिता के सामने काट दिये जाते है। मनुष्यो ने शक्ति अर्जित की, जिसके घमण्ड मे वह अन्य प्राकृतिक सहयोगियो को भूल गया है और उनका दोहन करने लगा। हमें उसका यही घमण्ड तोड़ना है। हमारे सामने हमारे अस्तित्च का संकट खडा है। अगर जल्दी ही कुछ न किया गया तो हम सभी जानवरो का अन्त निश्चित है। ऐसा नही है कि मनुष्यों को इन बातों का अहसास नही है किन्तु अपने फायदे, अपने स्वार्थ के आगे उनके लिए सब तुच्छ है। हमारी सभी समस्याओं से अवगत होने के बावजूद उनके व्यवहार में कोई परिर्वतन नही आया है। हमे न शासन का लोभ है, न सत्ता का लालच, लेकिन यदि हमें अपना अस्तित्व, अपने अधिकार इस पृथ्वी पर चाहिए तो हमे मनुष्यों को नष्ट करना होगा, उसे युद्ध मे परास्त करना होगा, उसे मिटाना होगा।”
इतना कहने के बाद सम्राट शेर कुछ देर के लिए शान्त हो गये। अन्य किसी जानवर की भी आवाज नही आ रही थी। सभी शान्ति से सम्राट को सुन रहे थे। चारो तरफ शान्ति व गम्भीरता का वातावरण था। एक क्षण रुक कर सम्राट ने फिर कहना शुरु किया-
“इसी मकसद से मैनें आप लोगो को यहाँ एकत्रित किया है। मैं मनुष्यो के खिलाफ युद्ध चाहता हूँ और इसी सम्बन्ध में मैं आपकी राय जानना चाहता हूँ।”
इस वक्तव्य के पूरा होते ही अब तक की शान्ति भंग हुई। मनुष्य से युद्ध, ये सुनकर ही सभी हैरान हो गये। उन्हे तो विश्वास ही नही हो रहा था कि वास्तव मे वो इसी विषय पर चर्चा करने के लिए यहाँ उपस्थित हैं। ये विषय जैसे उनके लिए हौव्वा बन गया था। इतनी विकट समस्या जैसे उनके जीवन मे कभी आई ही ना हो और उसी विषय को लेकर उनमे आपस मे कानाफूसी शुरु हो गई। कानफूसीè की ये आवाजें धीरे-धीरे प्रबल होती चली गईं। इसी भिनभिनाहट के बीच फॉक्स फॉली उठ कर खड़ी हुई। उसने अपने शब्दो पर जोर देते हुए सभी को सम्बोधित किया-
“सभी जानवरो को व उनके प्रतिनिधियो को अपनी बात कहने का पूरा हक है। जो युद्ध चाहते है, या जो नही चाहते हैं वो बिना किसी डर या हिचक के अपनी बात कह सकते हैं।”
लोमड़ी ने जब कहना शुरु किया तो कानाफूसी व भिनभिनाने की आवाज धीरे-धीरे कम होने लगी और अब तक वो बन्द हो गयी थीं। लोमड़ी ने फिर आगे कहना शुरु किया-
“ये एक अत्यधिक महत्वपूर्ण और सभी के जीवन से सम्बन्धित फैसला है। इसलिए किसी भी तरह की शक की गुंजाइश नही रह जानी चाहिए। इस योजना का कार्यान्वित होना या न होना आपके निर्णय पर निर्भर करेगा। हमें आपके साथ की आवश्यकता है, उसके बिना हमारी योजनाएं अधूरी हैं। मगर कोई भी निर्णय लेने से पूर्व इस बात को अवश्य ध्यान मे रखिएगा, कि हमें अपना अस्तित्व, अपने अधिकार चाहिए या मनुष्यों कि गुलामी। अब जो भी चाहे, एक-एक करके अपनी बात कह सकता है।”
तभी जमीन पर बैठे कुछ हिंसक पशुओ का समूह “हम तैयार हैं!”, “हम तैयार हैं!” कहते हुए उठ खड़ा हुआ। उनकी आवाज सुनकर अन्य पशु उनकी ओर देखने लगे। इन पशुओं का प्रतिनिधित्व बाघ कर रहा था। उसने खड़े होकर कहा-
“महाराज की जय हो! महाराज हम युद्ध में आपके साथ हैं। हमें आपके नेतृत्व पर पूरा भरोसा है। आपके एक इशारे पर हम अपनी जान की बाजी लगाने को तैयार है। ये मनुष्य सचमुच में स्वार्थी व क्रूर हो गया है। इसका विनाश होना ही चाहिए। पृथ्वी पर हमारा शासन होना ही चाहिए।” जैसे ही बाघ अपनी बात समाप्त की, तभी हाथी खड़ा हो गया। उसने कहा-
“कोई भी निर्णय लने से पूर्व हमें उस पर अच्छी तरह विचार कर लेना चाहिए, ये हमारे जीवन-मरण का प्रश्न है। जल्दी बाजी मे लिया गया निर्णय हमारे समूल विनाश का कारण बन सकता है। हमें महाराज के नेतृत्व पर कोई शक नही है, परन्तु मनुष्य से युद्ध करना इतना आसान नही है। मनुष्य से युद्ध कोई खेल नही है, जिसके परिणाम का प्रभाव सिर्फ दिलो-दिमाग पर ही पड़े। मनुष्यो के पास ऐसे आधुनिक हथियार है कि वो हमारा सफाया घन्टो मे कर सकते है। यहाँ कौन सा ऐसा जानवर है जिसे मनुष्य ने अपना गुलाम नही बनाया है या जो मनुष्य की शक्ति से नही वाकिफ है? क्या उनके हथियारो का सामना हममे से कोई कर सकता है? यदि युद्ध हुआ तो उनके बम, टैंक, तोप, मिसाइलें, मशीनगनें हमे ही झेलनी है। उनके पास इतने संसाधन है कि उनसे युद्ध मे विजय संभव ही नही है। मनुष्य से युद्ध तो मैं समझता हूँ, आत्महत्या करने के समान है। यदि युद्ध हुआ तो हमारा सहयोग अवश्य महाराज को मिलेगा, परन्तु युद्ध के सिर्फ एक ही पहलू पर ध्यान नही देना चाहिए। हमें उसके दूसरे पहलुओं पर भी विचार कर लेना चाहिए। कहीं ऐसा ना हो कि हम युद्ध छेड़ कर अपने विनाश को दावत दे रहे हों।”
हाथी अपना वक्तव्य पूरा करके अभी बैठ भी नही पाया था, कि हाथी की बात सुनकर चीता खड़ा हो गया-
“हाथी के मुँह से ऐसी बातें शोभा नही देती, हाथी तो हमें हतोत्साहित करने का प्रयास कर रहा है। युद्ध मे या तो हार होती है या जीत। हार के डर से चुपचाप बैठने वाले कायर कहलाते हैं, और हम कायर नही हैं।”
तभी लोमड़ी फिर खड़ी हुई, उसने चीता को शान्त करते हुए कहा-
“हाथी ने अपनी बात ठीक कही है, इस तरह के सवाल उठना स्वाभाविक है। मनुष्य की शक्ति से हममे से कोई भी अपरिचित नही है, उसने चाँद तक को जीत लिया है, पर इस युद्ध की योजना बनाने से पहले हमने इन सभी बातो पर गौर किया है जिसका खुलासा महाराज बाद मे करेगें।”
लोमड़ी के शान्त होने पर गीदड़ सभा मे से खड़ा हुआ। उसने कहा-
“महाराज के होते हुए हमे युद्ध मे कौन हरा सकता है। हमारे पास चीता, तेंदुंआ, हाथी, भालू जैसे अनेक जानवर हैं जो मनुष्य को अपने हाथो से मसल सकते हैं।”
अब चूहा खड़ा होता है –
“महाराज! इस युद्ध मे हम जैसे छोटे जानवरो का भला क्या काम हो सकता है? हम तो किसी भी काम नही आ सकते। हमलोंगो के युद्ध मे भाग लेने से कोई भी फायदा नही है, इसलिए हम लोगो का इस युद्ध से अलग रहना ही बेहतर है।”
अब एक-एक करके सभी जानवरों ने अपनी बात कहना शुरु कर दिया। कुत्ते ने कहा-
“मै अपनी स्वामिभक्ति के लिए विश्व विख्यात हूँ। पिछले १२००० सालों से भी ज्यादा समय से हमारी प्रजाति मनुष्यों के साथ मित्रवत् रुप से रही है। मनुष्यों के साथ रहने वाले हममे से कई कुत्तो की स्थिति बहुत अच्छी है। वे कार से घूमते है, बड़े-बड़े आलीशान बंगलो मे रहते है। लेकिन वहीं दूसरा पहलू भी है। हममे से अधिकतर कुत्ते सड़क छाप ही होते हैं, और उन्हें सडको पर ही जीवन व्यतीत करना पड़ता है। खाने के लिए हम दो रोटी तक को मोहताज रहते है। पहले मनुष्य ने हमें अपनी तरह ढाल लिया, अब हम उन्ही के द्वारा दिए भोजन पर आश्रित हो गये हैं, अन्य कुछ अब खा नही सकते। जो कुत्ते मनुष्य के परिवारो के साथ रहते है, उनके साथ भी समस्या है। उनमे से कई भाईयो की शादी नही हो पाती। लोग अक्सर कुत्ते या कुतिया किसी एक को ही पालते है। जो पालतू हैं, उन्हे यदि कभी बच्चे हुए तो मनुष्य बचपन में ही हमारे बच्चों को हमसे अलग कर देते हैं। युद्ध मे शामिल होने के लिए हमारे सामने एक ही समस्या है यदि हम इस युद्ध मे शामिल हुए तो हमारी स्वामिभक्ति पर धब्बा लग जायेगा और फिर कोई भी मनुष्य हम पर विश्वास नही करेगा। यदि हम हार गये तो हम ना घर के रहेंगे ना घाट के।”
कुत्ते का समर्थन करते हुए घोड़े ने कहा-
“हाँ महाराज! हमारी समस्या भी कुत्तो के समान ही है, लेकिन हमारी मुख्य समस्या स्वतंत्रता की है। हजारों सालों से उन्होंने हमें अपना गुलाम बना रखा है। स्वयं तो वो आपस में लड़ते ही है हमें भी अपने युद्धों में सैकड़ों सालों तक इस्तेमाल करते रहे। मेरी वजह से लोगो ने कितने ही युद्ध जीते, लेकिन अब उनको मेरी उतनी जरुरत नही है। कुछ लोग अपने शौक व मनोरंजन जैसे घुड़दौड़ इत्यादि के लिए हमें रखते तो हैं ,पर यदि मैं उनके काम का न रहा तो वो हमें गोली मार देते हैं। मै हवा मे उड़ने वाला जानवर हूँ। पहले तो हमेशा उड़ता रहता था, मगर अब अस्तबलों मे बन्द हो गया हूँ, जहाँ मेरा दम घुटता है। मैने अपनी स्वामिभक्ति पूरी निष्ठा से निभायी है, मगर मनुष्यो के मेरे प्रति बदलते व्यवहार से मै खिन्न व व्यथित हो गया हूँ। मनुष्यों को भी अब मेरी अधिक जरुरत नही रह गयी है। इसलिए मै बस किसी तरह स्वतंत्रता चाहता हूँ। हमारी जाति मनुष्यों की युद्ध प्रणाली से भी परिचित है, अतः हम मनुष्यों के खिलाफ युद्ध में आपकी मदद भी कर सकते हैं।”
गाय-
“मेरी हालत भी अन्य जानवरो जैसी ही है। हिन्दुस्तान मे मुझे पूजा तो जाता है, लेकिन हालात मे कोई फर्क नही है। जब तक मै दूध देती हूँ, लोग मुझे सानी देते है, अन्यथा खुला छोड़ देते हैं। फिर मुझे भोजन के लिए मारे-मारे भटकना पड़ता है। अपने बछड़े तक को मै दूध कायदे से नही पिला पाती। इन सब के बावजूद इसे ही मैने अपना भाग्य मान लिया है, विधाता ने जो रच दिया है उसी मे स्वयं को संतुष्ट कर लिया है। यदि विधाता ही हमसे रुठा हुआ है, यदि वही नही चाहता तो हम अपनी तकदीर कैसे बदल सकते हैं। शायद वो हमारे पिछले जन्मो के कर्मो का फल हमें दे रहा हो, इसलिए युद्ध से हमें कुछ भी भला नजर नही आता। मार-काट-हिंसा किसी समस्या का समाधान नही है। मुझे इन चीजो से नफरत है। इसलिए मै सोचती हूँ कि हमें किसी और दिशा की ओर सोचना चाहिए। इसके साथ ही ना मेरे पंजें हैं, ना दाँत, ना भाग सकती हूँ, ले दे कर एक सीगं है, उससे भी हत्या कर पाना मेरे बस का नही है, इसलिए मै यही चाँहूगी कि युद्ध न हो, तो ही अच्छा है।”
बैल गधे और खच्चर-
“हम जैसे जानवरो की दशा अत्यन्त ही दयनीय है। हमसे सिर्फ अधिक से अधिक काम लिया जाता है और काम करने के बावजूद हमें बहुत मार खानी पड़ती है। खाने के नाम पर जो बचा खुचा डाल दिया जाता है, वो एहसान कर दिया जाता है, न जाने ईश्वर कब हमारे दुःखो को सुनेगा। इसलिए हम जैसे जानवर इस युद्ध में महाराज के साथ हैं। बार-बार मरने से तो अच्छा है कि एक ही बार मरा जाय।”
जेब्रा, जिराफ, चील, बारहसिंहा इत्यादि शाकाहारी व सीधे जानवरो का प्रतिनिधित्व करते हुए हिरन ने कहा-
“महाराज! युद्ध मे चाहे जीत हो चाहे हार, युद्ध का फायदा तो उसे
ही होना है जो शक्तिशाली है। यदि पशु युद्ध मे मान लिया जीत भी गये तो भी क्योंकि शक्ति हिंसक पशुओ के हाथ में है, सत्ता भी उन्ही के हाथो मे रहेगी। उससे हमारी स्थिति मे क्या फर्क पड़ेगा। माना कि मनुष्य हमारा विनाश कर रहा है, मगर हिंसक पशु भी तो हमे मार कर खाते ही हैं। हमें तो इस युद्ध से सिर्फ हानि ही है, फिर इस युद्ध मे हमारा भाग लेने का क्या प्रयोजन है?”
इस तरह से एक-एक करके जमीन पर रहने वाले सभी जानवरो में, जो भी कुछ कहना चाहता था, उन्होंने कह दिया था। सभी पशुओं को सुनते- सुनते दोपहर बीत गई थी। अब बारी थी, पानी मे रहने वाले जानवरो की। इससे पहले की सम्राट मछलियों का मन्तव्य सुनते, उन्होंने सभी पशुओं को दोपहर का भोजन कर लेने के लिए कुछ अवधि की छूट देनी चाही। किन्तु पशुओं की भूख-प्यास मर चुकी थी। वो एक अत्यन्त गम्भीर समस्या पर विचार कर रहे थे। अतः सभा में कोई खलल डाले बिना कार्यवाई आगे बढ़ती गई। बड़ी मछलियों या समुद्र मे रहने वाली मछलियों के प्रतिनिधि के रुप मे एक डॉल्फिन मछली इस सम्मेलन मे भाग ले रही थी। डाल्फिन एक ऐसी मछली थी जो समुद्र व नदी दोनो जगहों पर रह सकती थी। जबकि अन्य समुद्री मछलियों का खारे पानी को छोड़कर अब तक नदी के मीठे पानी में आना नही हुआ था। उसने कहा-
“जंगल के महाराज को हमारी समुद्र की महारानी शार्क सिलिका का सादर प्रणाम। इस सम्मेलन मे भाग लेने से पूर्व मुझे इस बात का जरा भी आभास नही था कि हम यहाँ मनुष्यों से युद्ध सम्बन्धी गम्भीर समस्या पर विचार-विमर्श करने के लिए एकत्रित हो रहे है, इसलिए इस युद्ध मे शामिल होने या ना होने का कोई भी आश्वासन मैं नही दे सकती। इसके लिए मुझे व स्वयं महाराज को हमारी महारानी से बात करनी होगी। मैंने यहाँ के अन्य पशुओ की बात सुनी है और हमारी भी समस्या इससे भिन्नम नही है। यद्धपि मनुष्य हमारे रहने के स्थानो पर कब्जा करने मे अब तक तो असमर्थ रहा है, तथापि उसने हमारी स्वच्छंदता पर पहरा तो लगा ही दिया है। समुद्री जीवो के शिकार में बेतहाशा वृद्धि हुई है। बहुत ही बड़ी संख्या मे लाखों-करोड़ों मछलियाँ रोज उनका शिकार होती हैं। समुद्री जीवो के लिए भी मनुष्यों ने वन्य जीवो के समान ही अस्तित्व का संकट पैदा कर दिया है। व्हेल, आक्टोपस इत्यादि कई मछलियाँ और समुद्री जीव समाप्ति के कगार पर आ गये हैं। इसलिए मनुष्य हमारा भी उतना ही बड़ा दुश्मन बन गया है, जितना वो आपका है। मैं अपनी महारानी को आपकी बात अच्छी तरह समझाने का प्रयास करुंगी और मुझे उम्मीद है कि वो आपके प्रस्ताव से सहमत होगीं।”
“आप अपनी महारानी को हमारा संदेश कहिएगा, कि हम उनसे इस सिलसिले मे इस सभा के बाद स्वयं बात करेंगे। हम उनके तहे दिल से आभारी होंगे, अगर उन्होंने हमारी बात को समझने का प्रयास किया। मुझे उम्मीद है, कि यदि वो हमारी बात समझ सकीं, तो वो हमें सहयोग अवश्य करेंगी।” सम्राट शेर मदीबा ने कहा।
“इस सम्बन्ध मे मैं नदी में रहने वाली छोटी मछलियों की राय भी अवश्य जानना चाहूँगा।”
छोटी मछलियों का प्रतिनिधित्व करते हुए रोहू मछली बोली-
“मुत्यु का कष्ट तो हमे भी होता है, परन्तु हमारे लिए तो एक तरफ कुआँ है, तो दूसरी तरफ खाई। हमें तो बड़ी मछलियाँ भी अपना शिकार बनाती हैं और मनुष्य भी, फिर भी इन दोनो मे हमारा ज्यादा बड़ा दुश्मन मनुष्य ही है। इसलिए यदि युद्ध हुआ और सभी जलचरों ने उसमे भाग लिया, तो महारानी के आदेश पर हम इस युद्ध में जानवरों का सहयोग कर सकते हैं।”
नदी में रहने वाले जलचरों में मगरमच्छ व घडि़याल प्रमुख थे व नदी में उन्ही की हुकूमत चलती थी। जब उनसे उनकी राय नही पूछी गई और उनकी जगह छोटी मछलियों से नदी में रहने वाले जलचरों की राय जानने की कोशिश की गई तो मगरमच्छों व घडि़यालों को गुस्सा आ गया। वो क्रोधित हो बोले-
“मेरी भी पीढ़ी इस संसार में ६५०० वर्षो से है क्या मछलियों से ही राय ली जायेगी। क्या हमारी राय मायने नही रखती?”
सम्राट थोड़ा पशोपेश में फंस गये। स्थिति की नाजुकता को समझते हुए लोमड़ी फॉली ने पहल की-
“हम इसके लिए माफी चाहते हैं। हम चाहेगें की आप भी अपनी राय अवश्य रखें।”
“ठीक है, कोई बात नही। जब हम सब युद्ध में शामिल हो रहे हैं, तो इस तरह से बैर रखना ठीक नही होगा। मछलियाँ इस युद्ध में हिस्सा लें या न लें, हमारी प्रजाति इस युद्ध में पशुओं के साथ है।”
इस प्रकार मगरमच्छों और घडि़यालों ने इस युद्ध के लिए अपनी हामी भर दी।
अब बारी कीड़े-मकोड़ो व कीट-पतगों की थी। उनका प्रतिनिधित्व करते हुए टिड्डे ने कहा –
“मनुष्यो से कीड़े-मकोड़ो व कीट-पतंगो की लड़ाई तो हमेशा ही चलती रहती है, यदि युद्ध हुआ तो ये हमारे लिए नई बात नही होगी, जहाँ मनुष्य हमें मारता है, हमारा उपयोग अपने लिए करता है, वहीं हम भी मनुष्य की अनाज, उनकी फसल उनके खाद्य पदार्थ व खून पर निर्भर हैं, या यूँ कह ले कि हमने ही मनुष्य के खिलाफ युद्ध छेड़ रखा है, और शायद मनुष्य हमीं से सबसे ज्यादा परेशान है। हर साल लगभग दो करोड़ से ज्यादा मनुष्य को तो हमारे मच्छर ही मार डालते हैं। इस पर भी मनुष्य पर विजय प्राप्त करना हमारे लिए गर्व की बात होगी। इसलिए इस युद्ध मे हम पशुओं को अपना पूरा सहयोग देगें।”
तभी मच्छर उठ कर खड़ा हुआ और चिल्लाने लगा-
“उनका खून चूसने मे बहुत मजा आयेगा। खून की नदियाँ बहेंगी, हम उसमे गोते लगाएगें।”
“शान्त छोटे भीम! शान्त!” सभी मच्छर को शान्त कराने लगे।
अब सिर्फ पक्षी ही रह गये थे जिन्होंने अभी तक अपना मत नहीं दिया था। इसलिए सबसे अन्त मे पक्षियों का प्रतिनिधित्व करते हुए सम्राट के नजदीक ही एक पेड़ की डाल पर बैठे हुए गिद्ध ने कहा-
“हम पक्षियों मे भी दो मत है, हम जैसे माँसाहारी पक्षी तो युद्ध के पक्ष मे हैं, लेकिन अन्य पक्षी युद्ध के लिए पूरी तरह तैयार नही हैं या वे युद्ध से डरते है, जबकि वे मानते है कि मनुष्य से उनको सबसे ज्यादा नुकसान है। यदि मनुष्य इस संसार मे न रहे, तो उनकी मृत्यु की दर काफी कम हो जायेगी। मनुष्य ने ही उन्हे पिंजरे मे बंद कर रक्खा है। तथापि उनका ये भी कहना है कि वो युद्ध के लिए कारगर नही है, उनका युद्ध मे क्या उपयोग है? मनुष्य की हत्या कर पाना उनके लिए सम्भव नही है, इसलिए बेहतर हो यदि युद्ध के अलावा कोई अन्य रास्ता निकाला जाय।”
सभी की बात सुनने के बाद लोमड़ी महाराज शेर से सलाह करके फिर उठी और उसने सभी जानवरो को सम्बोधित करते हुए कहा-
“महाराज ने सभी जानवरो की बात ध्यान पूर्वक सुनी और समझी है, और वो आपके डर, आपकी समस्याओ से भी परिचित हुए हैं, जिनका वो निराकरण करेंगे। आप सभी जानवरों ने अपना मत प्रगट किया, परन्तु अभी ध्रुवीय प्रदेशों मे रहने वाले जानवरो जैसे पेंग्विन, वालरस व सील इत्यादि का मत हमें प्राप्त नही हुआ है, इसके लिए महाराज के प्रतिनिधि के रुप मे चील ‘जावा’ को उनसे बातचीत के लिए भेजा गया है, क्योकिं उनके लिए यहाँ के गर्म वातावरण मे आ पाना सम्भव नही हो सका। वैसे तो उसे सभा आरम्भ होने के पहले ही आ जाना चाहिए था, पर किसी कारण वश देरी हो गई होगी। चील जावा अभी आता ही होगा, उसके आने पर हमें उनका भी मंतव्य पता चल जायेगा।” अभी लोमड़ी अपनी बात कह ही रही थी कि चील उड़ता हुआ आया और महाराज की चट्टान के बगल मे रक्खी एक छोटी चट्टान पर बैठ गया।
चील ने आते ही महाराज को प्रणाम किया। चील का अभिवादन करते हुए लोमड़ी ने कहा-
“आओ चील, तुम्हारा स्वागत है, हम तुम्हारा ही इन्तजार कर रहे थे। तुम बहुत लम्बी यात्रा करके आ रहे हो पहले कुछ देर सुस्ता लो, फिर वहाँ का समाचार कहो।”
चील के आने पर सभी जानवरो मे कौतुहल सा मच गया। चील थोड़ा निराश लग रहा था। चील ने अपनी बात तुरन्त ही कहनी चाही, मगर महाराज ने उसे थोड़ा आराम करने का संकेत किया। थोड़ा सुस्ताने के बाद चील जावा ने अपनी बात कही-
“महाराज! मैंने आपका सन्देश बर्फीले प्रदेशो मे रहने वाले जानवरो को सुनाया और उन्हे अपनी बात समझाने की पूरी कोशिश की। लेकिन . . !”
“जब मैं ‘केप आफ गुड होप’ से उड़ान भर कर अंटार्कटिका पहुँचा, तो वहाँ का नजारा ही अलग था। चारों तरफ बर्फ ही बर्फ थी। जहाँ तक निगाह जाती थी, बर्फ ही बर्फ। बर्फ के पहाड़, बर्फ की नदियाँ। न पेड़, न पौधे न कोई अन्य वनस्पति, बस बर्फ ही बर्फ और उसमें मिलों तक फैले सील, पेंग्विन और वालरस जैसे धु्रवीय जानवर। इस समय वहाँ दिन का समय था और पेंग्विन, वालरस व सील इत्यादि ध्रुवीय जानवर खिली धूप में मस्ती कर रहे थे। मुझे कहीं बैठने की जगह नही दिखाई दे रही थी। तभी मेरी निगाह एक तरफ से सूखे एक छोटी चट्टान पर पड़ी। उसके ऊपर की बर्फ साफ करके मैं वहीं बैठ गया। मुझे देखते ही उन जानवरों मे कौतुहल सा मच गया। जैसे उन लोगो ने मुझ जैसे किसी जानवर को देखा ही ना हो, सभी मुझे घेर कर खड़े हो गये। उनकी आपस की बातें मैं आसानी से सुन सकता था। एक पेंग्विन दूसरे पेंग्विन से पूछ रहा था-
“ये कौन सा जानवर है? हममें से तो नही लगता।”
“आकाश से आया है, जरुर कोई मनुष्य जैसा होगा, मनुष्य भी आकाश से ही आता है।” दूसरे पेंग्विन ने सम्भावना जाहिर की।
उनकी बातें सुनकर मुझे अचरज हुआ। उनके लिए तो ये विश्वास करना सम्भव ही नही है कि हम जैसे अन्य जानवरो का अस्तित्व भी है । उनके लिए बर्फ ही उनका संसार है, उसके अलावा वो कुछ और नही जानते है । क्योकि मनुष्य वहाँ तक पहुँच पाया है इसलिए वो सिर्फ उसी को जानते है और उससे डरते भी है, फिर भी मैने उन्हे किसी तरह समझाया और उन्हे विश्वास दिलाने की कोशिश की कि हम जैसे अनेक जानवर इस विशाल पृथ्वी के अलग-अलग कोने पर फैले हुए है। यद्धपि कि उन्हे विश्वास नही हो रहा था फिर भी मैने उन्हे कुछ हद तक अपने विश्वास मे लेने में सफलता हासिल की और उनसे आपकी बात कही ।
“आप घबराइये नही। मैं भी आप जैसा ही हूँ। मुझे इस दुनिया में लोग चील के नाम से जानते है।”
“सुनकर हैरानी हुई! कहते हो हम जैसे हो, पर हम जैसे दिखते तो नही। ना ही तुम्हें पहले कभी यहाँ देखा है।”मेरे पीछे खड़े एक सील ने कहा।
“मैं यहाँ नही रहता। यहां से हजारो मील दूर हम जैसे विभिन्न प्रकार के लाखों जानवर रहते हैं।”
“हजारो मील दूर! विभिन्न प्रकार के जानवर! क्या इससे बाहर भी हमारी कोई दुनिया है?” एक दूसरे पेंग्विन ने मुझसे प्रश्न किया।
इसके बाद तो जैसे उन्होने मेरे सामने सवालों की झडि़याँ लगा दीं। एक के बाद दूसरे सवाल पेंग्विन, सील व वालरस मुझसे पूछने लगे। एक वालरस ने पूछा-
“क्या जहाँ मनुष्य रहते हैं?”
“हाँ, वहीं से।”
“मगर, तुम यहां क्यों आये हो, बरखुरदार? और हमसे क्या चाहते हो?”
“मैं यहाँ अपने महाराज, विश्व पशु सम्राट मदीबा का सन्देश लेकर आया हूँ। मनुष्य को तो आप जानते ही हैं, वो हम जैसे जानवरों को मिटाने पर तुला है। उसके अत्याचारों से आजिज आकर हम उसके विरुद्ध युद्ध करने जा रहे हैं, और इसी सम्बन्ध में हम आपकी सहायता चाहते हैं।”
“मगर हम तुम्हारी सहायता क्यों करें? तुम्हे तो हम जानते भी नही, मनुष्य को तो फिर भी हम कुछ हद तक जानते है।”
“मनुष्य दुष्ट प्राणी है, जैसे वो हमें मार रहा है, वैसे ही एक न एक दिन वो आपको भी मार कर खत्म कर देगा।”
“मारते तो हम भी मछलियों को हैं। एक दूसरे पर ही हमारा जीवन निर्भर है, यही प्रकृति का नियम है।”
“प्राकृतिक नियम तो हम सभी जानते हैं। मगर मनुष्य उन प्राकृतिक नियमों का पालन नही, अपितु उनका दोहन करता है. . . ।”
“क्या तुम हमें मनुष्यों के प्रति भड़काने का प्रयास कर रहे हो?”
“मैं आपको भड़का नही रहा हूँ, बल्कि समझा रहा हूँ।”
उनके सवालो का जवाब देते देते मैं थक गया था। पर उनके सवाल थे कि खत्म होने का नाम ही नही ले रहे थे। सूरज सर पर चढ़ा हुआ था।
यद्धपि कि वो मानने को तैयार नही थे, पर मैनें उन्हें अपनी बात समझाने का पूरा प्रयत्न किया, मगर उनका कहना है कि मनुष्य से उन्हे कोई खास खतरा नही है।” उनका कहना है-
“कि माना कि मनुष्य भोजन और वस्त्र के लिए हमारे ऊपर निर्भर हैं, वैसे ही वो भी भोजन के लिए मछलियों पर निर्भर हैं। मृत्यु तो प्रकृति का नियम है, इसी से जीवन चक्र शाश्वत बना हुआ है। इसके साथ ही इस क्षेत्र को छोड़कर जाना भी हमारे लिए सम्भव नही है। हमारी इतनी ही दुनिया है और इतने मे ही हम खुश हैं। इससे ज्यादा हमें कुछ नही चाहिए। आप में और मनुष्य में, मनुष्य ही हमे ज्यादा परिचित सा लगता है, इसलिए उसके विरुद्ध एक अपरिचित का साथ देना हमारे लिए सम्भव नही है।”
मैने उन्हे समझाने की कोशिश की, कि मनुष्य के स्वार्थी स्वभाव व क्रूरता से वो अभी अच्छी तरह वाकिफ नही हैं, आगे चलकर जब उन्हे इस बात का एहसास होगा, तब तक बहुत देर हो जायेगी और उन्हे पछताना पड़ेगा, परन्तु इसका भी उनपर कोई असर नही हुआ। अतः हार कर मुझे वहाँ से खाली हाथ लौटना पड़ा, मुझे इस बात का बेहद अफसोस है। मैं माफी चाहता हूँ, कि मैं अपने मकसद में कामयाब न हो सका। मैं अपनी असफलता के लिए बेहद शर्मिन्दा हूँ। इतना कहने के बाद चील जावा सर नीचा करके खड़ा हो गया।
सभी जानवर उसकी ओर दृष्टि लगाये हुए थे। कुछ जानवरों को निराशा हुई, तो कुछ को सुकून कि शायद इससे युद्ध टालने की दिशा मे कोई सहायता मिले। इस सभा में जहाँ युद्ध का माहौल बनने लगा था, चील के द्वारा अटांर्कटिक प्रदेशो से लाये गए इस सन्देश का उल्टा असर हुआ था। अंटार्कटिका में मिली असफलता के इस दंश ने इस सम्मेलन की सफलता पर ही प्रश्न चिन्ह लगा दिया था। इस खामोशी को तोड़ने के लिए फॉक्स फॉली फिर उठी। उसने बुद्धिमत्ता से काम लेते हुए कहा-
“आप दिल छोटा न करें। सफलता या असफलता तो ईश्वर के हाथों में है। आपने अपने स्तर पर सर्वोत्तम प्रयास किया, इतना ही काफी है।
जिन परिस्थितियों में आपको काम करना पड़ा या जैसे लोगों से आपको बात करनी पड़ी, उसमें यदि असफलता हासिल हुई तो इसके लिए आपकी योग्यता पर शक नही किया जा सकता, और महाराज इस बात से अच्छी तरह वाकिफ हैं, इसलिए आप अपना मन छोटा ना करें। यदि हमें उनका सहयोग नही मिला तो क्या, हमारे पास अनेको विकल्प खुले हुए हैं।
वैसे तो हम चाहते थे कि सभी पशु हमारा साथ दें, फिर भी यदि बर्फीले प्रदेशो मे रहने वाले कुछ एक जानवरो ने इस युद्ध मे भाग नही लिया तो भी उससे इस युद्ध की दिशा व सम्भवतः दशा पर कोई असर नही पड़ेगा। जैसा की मैने पहले ही कहा उन प्रदेशों के जानवरों का यहाँ के गर्म वातावरण में आ पाना सम्भव नही हो सका, उनके लिए यहाँ आकर युद्ध में भाग ले पाना भी सम्भव नही हो पाता, क्योकिं वो यहाँ के वातावरण के अनुकूल नही है। इसलिए हमें उनसे बहुत ज्यादा अपेक्षा नही थी। वैसे भी बर्फीले प्रदेशों की आबादी बहुत कम है और हमे मुख्यतः ऐसे स्थानो पर युद्ध करना है जहाँ मनुष्य की अपने संसाधनो के साथ अधिकता है। अतः हमें निराश होने की आवश्यकता नही है।
अभी तक हमने सभी जानवरो का मत सुना। अब वो जानवर अलग हो जायें जो युद्ध चाहते हैं, और वो दूसरी तरफ हो जायें जो युद्ध नही चाहते, और जो अनिर्णय की स्थि्ति मे हैं वो इन दोनो के बीच में हो जायें।”
लोमड़ी की आज्ञा पर सभी पशु अपने स्थान पर खड़े होने लगे। थोड़ी देर की मशक्कत के बाद पशुओं का तीन समूह बन गया। बाँयी ओर की भूमि और उससे लगे पहाड़ पर युद्ध चाहने वाले पशुओं का समूह था, जिनमे शेर, चीता, तेंदुआ, सियार, लकडबग्घा, बिल्ली, गधे, खच्चर, टट्टू, सुअर इत्यादि पशु थे। बीच मे ऐसे पशुओ का समूह था, जो अभी निर्णय नही कर पा रहे थे कि युद्ध मे वो शामिल हों या ना हों। इनमे मुख्यतः हाथी, भालू, घोड़ा, बन्दर इत्यादि थे। जो तीसरा समूह था वो युद्ध न चाहने वालों का था, इसमे मुख्यतः गाय, कुत्ता, खरगोश, हिरन इत्यादि जानवर थे। ये समूह सबसे दाहिनी ओर की भूमि और उससे लगे पहाड़ पर था।
इन तीन समूहों मे सबसे बड़ा समूह युद्ध चाहने वाले जानवरो का नजर आ रहा था। उसके बाद युद्ध न चाहने वाले जानवरों का। तीसरा व सबसे छोटा समूह ऐसे जानवरो का था जो अनिर्णय की स्थिति मे थे। ये तीन समूह बन जाने से ये स्पष्ट दिखाई दे रहा था कि ज्यादातर जानवर युद्ध ही चाहते हैं। ये लोमड़ी की बुद्धिमत्ता थी। उसने जानबूझ कर ये तीन समूह बनवाये जिससे अन्य जानवरों पर मनोवैज्ञानिक दबाव डाला जा सके।
अब सम्राट शेर मदीबा एक बार फिर उठे उसने तीनो समूहो पर दृष्टि डाली फिर अपनी उसी गम्भीर मुद्रा में कहा-
“मुझे खुशी है कि जानवरो का एक विशाल समूह इस युद्ध मे मेरा साथ देने को तैयार है और उसने मुझमें अपना विश्वास प्रकट किया है। मैं जानता हूँ कि ऐसे जानवर जो अनिर्णय की स्थिति मे हैं, या जो युद्ध नही चाहते वो भी मेरा साथ देंगे। मैने सभी की बात को ध्यान से सुना है और पाया है कि जो समस्या उन्हे युद्ध से विरक्त रहने के लिए प्रेरित कर रही है, वो बहुत अधिक गम्भीर नही है। अधिकतर समस्यायें सामान्य ही हैं, हममें से बहुत से जानवर ये अनुभव करते हैं कि उनका युद्ध मे प्रयोजन ही क्या है? वो सोचते है कि वो युद्ध मे किसी प्रकार सहायता नही पहुँचा सकते, इसलिए युद्ध में उनके भाग लेने का औचित्य ही नही बनता। मगर मैं उन्हें बताना चाहूँगा कि युद्ध सिर्फ सैनिको से नही जीता जाता। किसी भी सेना में युद्धक सैनिक की संख्या बहुत बड़ी नही होती, बल्कि उससे भी अधिक संख्या उन सैनिको की होती है, जो इन सैनिको को अन्य रुप मे सहायता पहुँचाते है और इनका भी युद्ध मे उतना ही महत्व है जितना युद्धक सैनिकों का। इसलिए आप अपने मन से ये बात तो पूरी तरह निकाल दीजिये कि आपका इस युद्ध मे प्रयोजन क्या है? ये मुझे पता है, कि मुझे किसका प्रयोग किस रुप में, कहाँ, कैसे, कितना करना है, आपमें से हर एक जानवर का अपना महत्व है, और मुझे इसलिए हर जानवर की भागीदारी इस युद्ध मे चाहिए। आपमें से शायद या निश्चित ही बहुत से जानवर ये नही जानते हैं, कि वे युद्ध मे क्या भूमिका या संभवतः निर्णायक भूमिका भी निभा सकते हैं। आपके अस्तित्व का बोध अभी आपको नही है, और इसका बोध कराना मेरी जिम्मेदारी है। इसलिए मैं चाहूँगा, कि ये बात आप अपने मन से निकाल कर इस युद्ध मे भाग लें और मुझमें अपना विश्वास प्रकट करें।
दूसरी समस्या ऐसे जानवरों की है, जो मनुष्य के साथ रहते-रहते काफी हद तक उसी मे ढल गये हैं। मनुष्य के विरुद्ध होना या उससे अलग हट कर सोचना उसके लिए आसान नही है, जो कि स्वाभाविक ही है, और जब युद्ध की बात हो तो और भी ज्यादा, मगर आप ही सोचिए कि जिस मनुष्य की आप ने इतनी सेवा की, उसके बदले मे आपको उससे क्या मिला? क्या आपको उसके साथ रहने का यथोचित सम्मान मिला है? आप इतने वर्षो से मनुष्यों के साथ हैं, क्या उसने आपको मित्रवत स्थान दिया है? उसने आपको सिर्फ अपना गुलाम ही समझा है और उसके समाज में आपका आज भी वही स्थान है। उसने आपसे लेने के सिवा आपको दिया कुछ नही है। मनुष्य एक दुष्ट प्राणी हो गया है। कहा भी गया है “शठे शाठ्यम समाचरेत” अर्थात दुष्ट के साथ दुष्टता का ही व्यवहार करना चाहिए। इसलिए मनुष्य के खिलाफ युद्ध करने मे कुछ भी अनुचित नही है। दुष्ट को अपनी दुष्टता का दण्ड मिलना ही चाहिए। आपमें से कुछ जानवर जो अपनी विश्वसनीयता इत्यादि को लेकर संशय की स्थिति मे हैं, वो अपने संशय से बाहर निकलें और सोचे कि ऐसे व्यक्ति के लिए वो क्यों अपनी वफादारी दिखाये जो उनके लिए कभी नही सोचता, आप अपनी वफादारी जानवर जाति के लिए दिखाइये। स्वार्थी के प्रति अपनी वफादारी दिखाने का ना तो कोई औचित्य है और ना ही कोई लाभ।
कुछ जानवरो ने यह शंका जताई है कि यदि हम जीत भी गये तो उन्हे क्या लाभ होगा। ऐसे जानवरो से मै कहना चाहूँगा कि यदि हम जीत गये तो उन्हे भी वही सुविधायें, वही अधिकार मिलेगे जो अन्य जानवरो को प्राप्त होगें, सभी जानवरो मे समानता होगी। मनुष्य पर विजय प्राप्त करने के बाद मॉंसाहारी पशुओ को माँस मनुष्य से ही प्राप्त होने लगेगा, फिर आपस मे एक दूसरे का वध करने की आवश्यकता ही नही रह जायेगी। मैने पहले ही कहा है कि माँसाहारी पशुओं को वध मजबूरी मे करना पड़ता है, हमें निरीह जानवरो को मारने का शौक नही होता, मगर अपने जीने के लिए माँसाहारी पशु अन्य पशुओ पर ही एकमात्र निर्भर है, अतः मजबूरी मे हमें वध करना पड़ता है। रहा सत्ता का प्रश्न तो सत्ता सिर्फ माँसाहारी पशुओ के पास रहेगी, ऐसी कोई बात नही है। जो सत्ता के योग्य है, वो सत्ता का उपयोग करेगा। सत्ता के बँटवारे के लिए योग्यता उत्तरदायी होगी, एकमात्र शक्ति नही।
इन सब मे जो सबसे गम्भीर समस्या जानवरो के मन में समाई हुई है, वो है डर की, मनुष्य से डर की, उसके ताकत से डर की। हममें से अधिकतर जानवर मनुष्य से डरा हुआ है, उसके सामने वो अपने आप को निरीह मानता है, वो सोचता है कि मनुष्य के सामने वो एक पल भी नही टिक पायेगा, मगर मै आपसे कहना चाहूँगा कि मनुष्य को हराना कभी भी उतना मुश्किल नही रहा है, मुश्किल है तो उस जीत को स्थाई बना पाना, मनुष्य पर शासन को स्थायी बना पाना, पर अब यह सम्भव हो सकेगा।
अब हम इस बात मे समर्थ हो गये हैं कि हम मनुष्य पर अपने शासन को जीत के बाद स्थायी बना सकें। इस सम्बन्ध मे मै अपनी एक योजना का खुलासा आपके सामने करना चाहूँगा। मैने जब से शासन सम्भाला है तब से निरन्तर यह विचार मेरे मन मे घूमता रहा है और इस समस्या को सुलझाने के लिए मै निरन्तर सोचता रहा हूँ। अन्ततः मुझे सफलता प्राप्त हुई और इस समस्या का समाधान भी हमने खोज लिया। आप सभी जानते है कि मनुष्य का सबसे घातक हथियार परमाणु बम है। मनुष्य सिर्फ हमारा ही दुश्मन नही है, स्वयं अपना भी दुश्मन है, एक-दूसरे का दुश्मन है। इसी प्रवृत्ति ने उसे घातक से घातक हथियार बनाने के लिए प्रेरित किया, और वो एक से एक विनाशकारी हथिायार बनाता चला गया। इसी क्रम मे उसने परमाणु हथियार बनाये और एक नही, हजारो की संख्या मे बनाये। इन परमाणु हथियारों की विनाश क्षमता इतनी है कि एक बम यदि किसी शहर पर गिरा दिया जाय तो पूरा का पूरा शहर तो राख मे मिल ही जाता है, उसके साथ-साथ कितने ही अन्य शहर-गाँव भी तबाह हो जाते हैं। यदि इन सभी परमाणु बमों का प्रयोग एक साथ कर दिया जाय तो सम्पूर्ण विश्व का अस्तित्व ही खतरे मे आ जायेगा। इन बमों को संचालित करने की सारी कार्यप्रणाली कम्प्यूटरीकृत है। कम्प्यूटर, कुछ यूँ कह लें कि मनुष्यो को इतने काम करने पड़ते हैं कि सिर्फ एक दिमाग से उसका काम नही चल पाता और अपनी सहायता के लिए उसे दूसरे दिमाग की जरुरत पड़ती है और कम्प्यूटर कई धातुओ से बना ऐसा ही दिमाग हैं, जो मनुष्य के शरीर मे अन्दर न रहकर बाहर होता है। इन्ही कम्प्यूटरों की मदद से वह अपने परमाणु बमो को संचालित करता है, जिसके लिए कुछ निश्चित कोड बनाये गये हैं। जो कि उनकी भाषा मे कुछ शब्दो मे हैं। हमने इन्ही कोडो को प्राप्त करने मे सफलता हासिल की है तथा परमाणु बमो को संचालित करने की पूरी जानकारी इस समय हमारे पास मौजूद है, जिसके बल पर हम मनुष्य पर अपने शासन को स्थायी बना सकते है। इन जानकारियों को हासिल करने मे हमें काफी मेहनत करनी पड़ी। कई साल के निरन्तर प्रयास के बाद इन कूट शब्दों (कोड वर्डो) को चुराने व इन्हे संचालित करने मे हम सफल हुए है। इसके लिए मै अपनी उस टीम का विशेष आभारी हूँ जिसने इस कार्य को अंजाम दिया। इसमे सबसे अधिक महत्वपूर्ण भूमिका टीकू बंदर की रही है।
इतिहास गवाह है कोई व्यक्ति बलवान नही होता, बलवान होता है समय, और समय अब हमारा आ रहा है। बस जरुरत है हम उसे यदि पहचान सके, उसका सदुपयोग कर सकें। युद्ध मे हार या जीत तो होती ही रहती है इस बात से डर कर कोई युद्ध नही लड़ा जाता, मगर फिर भी मै आपको विश्वास दिलाना चाहूँगा, कि ईश्वर ने चाहा तो जीत हमारी ही होगी। मनुष्य को हमारे सामने घुटने टेकने पड़ेगे, बस जरुरत है तो हम सब के एक साथ तैयार होने की, हम सभी मे एकता की। एकता के आगे बड़ी से बड़ी शक्ति भी झुक जाती है, और मनुष्य को भी झुकना पड़ेगा। मैं जब आपको अपनी रणनीति व योजनाओ के बारे मे बताऊँगा तो आपको भी इसका विश्वास होगा। जानवरों के और इस पृथ्वी के समस्त इतिहास मे यह पहला मौका है, जब जानवरो में एकता की अत्यन्त आवश्यकता है। यदि हम एक बार चूक गये तो फिर हमेशा के लिए हमें गुलाम बनकर रहना पड़ेगा। इस युद्ध के लिए ये आवश्यक है कि हम सभी मिलकर एक-दूसरे के साथ होकर एक साथ युद्ध करें। यदि हममें से कोई भी अलग हुआ, तो ये हमारे लिए खतरे का संकेत हो सकता है। मैं सभी जानवरों से अपील करता हूँ, कि वो अपनी वफादारी केवल जानवर जाति के प्रति ही दिखाए, कोई मनुष्य हमारा साथ नही दे सकता तो हममें से कोई जानवर उनका साथ क्यों दे? कोई भी जानवर सिर्फ अपने हित के बारे मे न सोचकर सम्पूर्ण जानवर जाति के हित के लिए हमारे साथ मिलकर युद्ध मे सहयोग करे। एक तरफ हमारे सामने विश्व का साम्राज्य है, दूसरी तरफ अस्तित्व का संकट। अगर हम हार भी गये तो क्या-मिट ही जायेंगे न? मनुष्य वैसे भी हमे नही छोड़ेगा, वो हमें मिटा कर ही दम लेगा, मगर अगर हम जीत गये तो विश्व साम्राज्य का सुख भोगेंगे। अब आगे फैसला आपको करना है।”
सम्राट के इस सारगर्भित भाषण का जानवरो पर काफी असर पड़ा। युद्ध न चाहने वाले जानवर व अनिर्णय की स्थिति वाले जानवरो में से काफी जानवर निकलकर युद्ध चाहने वाले जानवरो मे सम्मिलित हो गये थे। अब सिर्फ गाय, हाथी और हिरन जैसे ही कुछ जानवर व पक्षी रह गये थे, जो युद्ध चाहने वाले जानवरों मे नही शामिल थे। इस प्रकार अब सिर्फ दो समूह ही रह गये थे। इन बचे हुए थोड़े से जानवरों का प्रतिनिधित्व करते हुए हाथी हम्पी ने कहने का साहस किया-
“महाराज हमें भी आप अपने साथ ही समझें, परन्तु कुछ शंकाए अभी भी मन मे बनी हुई हैं, अतः हम उनका भी निवारण चाहते हैं। मान लें कि हम युद्ध मे विजयी भी हो गये, तो भी इस युद्ध को जीतने मे हमें अपने लाखो अन्य सहयोगियो की जानें गवानी पड़ेंगी। इतनी बड़ी संख्या मे जानों की आहुति देकर युद्ध जीतने से क्या लाभ? अतः क्या यह श्रेष्ठ न होगा कि इस महायुद्ध की शुरुआत से पहले हम मनुष्यो से बातचीत कर समझौता कर लें। यदि समझौता ना हो सके, तभी युद्ध का निर्णय हो।”
हाथी हम्पी की शंका के समाधान के लिए सम्राट शेर मदीबा ने कहा-
“जहाँ तक बातचीत व समझौते का प्रश्न है वो कोई नई बात नही है। कुछ मनुष्य दुनिया मे अच्छे भी है और उन्होने जानवरो के संरक्षण के लिए कितने ही कानून बनाये है, परन्तु उनका पालन तो उन्ही साधारण मनुष्यो को करना है जिसमे हमेशा ही स्वार्थ भरा रहता है। यदि हम समझौता कर भी लें तो भी इससे कोई लाभ नही होगा। स्वयं मनुष्य ने अपने आप को सुधारने के लिए कितने ही धर्म चलाए मगर मनुष्य अब तक नही सुधर पाया, बल्कि उन धर्मो मे विकृतियाँ अवश्य आ गयी, क्योंकि उस श्रेंष्ठ धर्म चलाने वाले व्यक्ति के बाद उसका संचालन व पालन तो उन्ही साधारण मनुष्यों को करना है। अतः समझौते के लिए बातचीत करने से सिर्फ नुकसान ही है, इससे वो हमारी ओर से सशंकित व सावधान हो सकते है, हमें जो करना है अचानक ही करना है। रहा प्रश्न लाखों जानवरों की आहुति का, तो बिना उसके क्रान्ति कभी नही आयी है। इस परिप्रेक्ष्य मे हर युद्ध का परिणाम तो दुःखद ही होता है, मगर जिस परिणाम के लिए हम युद्ध करते हैं, वो शायद इस परिणाम से ज्यादा महत्वपूर्ण होता है।
भविष्य के बारे मे सोचना, ये वर्तमान का ही उत्तरदायित्व है। वर्तमान सिर्फ वर्तमान के बारे में सोचकर अपना अस्तित्व ज्यादा दिनों तक नही बनाये रख सकता। उदाहरण आपके सामने है, मनुष्य ने भविष्य के बारे मे सोचा, आज सत्ता उसके पास है, शक्तिशाली है वो, अपना विकास कर रहा है वो। हमने सिर्फ वर्तमान के बारे मे सोचा, गुलाम है हम, मनुष्य की इच्छा पर निर्भर हो गये है हम, अपने अस्तित्व का संकट दिखाई देने लगा है हमें, और उसके लिए अब हमे जूझना पड़ रहा है। यदि हम भी भविष्य के प्रति पहले से सचेत रहते तो आज हम भी मनुष्य के साथ कन्धे से कन्धा मिलाकर चलते। हमें आपने प्राणो की आहुति देनी पड़ेगी, कोई बात नही है। मुख्य बात ये है, आम बात ये है, कि हमारे बच्चे सुखी रहेंगे, हमारी आने वाली नस्लें जीवित रह सकेंगी, उन्हे अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष नही करना पड़ेगा।
मै मनुष्य के खिलाफ युद्ध की घोषणा करता हू्ं। हममें से सभी जानवर ये सोच ले, ये जान ले कि उन्हे युद्ध मे भाग लेना ही है, या तो वो हमारे साथ हो अन्यथा वो मनुष्य के साथ समझे जायेगें और हम उन जानवरो को अपना शत्रु समझेंगे।”
अपना भाषण समाप्त कर सम्राट शेर मदीबा अपने आसन पर आसीन हो गये। सभी जानवर हाथी के निर्णय की प्रतीक्षा उत्सुकता से कर रहे थे। अन्ततः हाथी ने भी अपने समूह के अन्य जानवरो के साथ युद्ध मे भाग लेने का फैसला किया। इससे सभी जानवर खुश हो गये और हर्षनाद करने लगे।

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