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ईश्वर की खोज

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प्रस्तावना

ईश्वर को समझने की जुगत हजारों सालों से चल रही है। दुनिया के कई लोगों ने, धर्मो ने अपनी अपनी परिकल्पनाएं दी हैं। मैंने भी अपनी जानकारी के अनुसार अपनी परिकल्पना दी है।
मैं जो कुछ भी लिख रहा हूँ वो मेरा अनुभव, थोड़ी रिसर्च व परिकल्पना मात्र है। आप को अगर ये गलत लगता है तो खंगालिये थोड़ा सा इन्टरनेट, कुछ रिसर्च करिये हर एक मुद्दे पर। हो सकता है आप मुझसे बेहतर या शायद पूर्ण सच बाहर ला सकें। मै किसी भी वक्तव्य के सच होने का दावा नही कर रहा हूँ, ये मेरी सोच व परिकल्पना मात्र है। अगर ये पूरी सच्चाई नही भी हुई, तो भी ये आपको सच्चाई तक पहुँचने में बहुत ज्यादा मदद करेगी। सम्भावत: ये पुस्‍तक ईश्वकर को लेकर मानव मन में उपज रही सभी प्रश्नों के उत्तपर देने में सक्षम होगी। अन्ततः किसी भी चीज का सही उत्तर वैज्ञानिक व विज्ञान ही हमें दे सकता है।
– लेखक

God is an equation which can not be solved।
Whenever it is solved, it would not be a God।

ईश्वर वो पहेली है, जिसे सुलझाया नही जा सकता।
जब कभी भी ये पहेली सुलझ जाती है, तब वो ईश्वर नही रह जाता।

हजारों सालों से हम ईश्वर की पूजा करते चले आ रहे हैं, और हमारा मन ये जानने को बेचैन रहता है कि आखिर वास्तविक ईश्वर कौन है? किसने हमें बनाया, किसने हमारे ब्रम्हाण्ड को बनाया, इस सम्पूर्ण विधि-विधान का रचयिता कौन है? इन्हीं सवालों के जवाब हम हजारों सालों से ढूंढते आ रहे हैं और इसी का जवाब देने की कोशिश हमारे धर्मो ने व इन धर्मो के चलाने वालों ने अलग-अलग तरह से की है। पर इन सब की परिभाषाओं के बावजूद हमारा मन संतुष्ट नही होता। वास्तविकता ये है कि अभी तक हमें सही ईश्वर, वास्तविक ईश्वर नही मिला है। हमारे धर्मो ने व इसके चलाने वालों ने कुछ हद तक हमारी मदद की है, अपनी-अपनी परिकल्पनाएं देकर, पर हम अभी तक मंजिल तक नही पहुंचे हैं। मैं भी, वास्तविक ईश्वर के बारे में अपनी परिकल्पना, यहाँ दे रहा हूँ। हो सकता है ये मंजिल न हो, तो भी ये एक कदम तो अवश्य होगा, हो सकता है इस परिकल्पना द्धारा हम ईश्वर के काफी करीब तक पहुँच भी सके हों।

ईश्वर कौन है?
ईश्वर को समझने के लिए पहले हमें ईश्वर की परिभाषा गढ़नी होगी। या ऐसी परिभाषा जो सबको मान्य हो उसे अपनाना होगा। या जितनी भी परिभाषाएं विश्व में ईश्वर के लिए लिखी गईं हैं, उनमें ज्यादा शर्तो को जो पूरा करता है, वही ईश्वर है।
तो एक सर्वमान्य परिभाषा जो मुझे समझ में आती है उसके अनुसार
वो इस ब्रम्हाण्ड का रचयिता होना चाहिए।
वो सर्वशक्तिमान होना चाहिए।
वो सर्वव्यापी होना चाहिए।
वो सर्वज्ञाता होना चाहिए।
उसके बाद कुछ भी नही होना चाहिए। अर्थात् वो अजन्मा होना चाहिए।

इसी कसौटी पर हम ईश्वर को परखने व पाने की कोशिश करेगें।
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ईर्श्वर की उत्पत्ति को समझने के लिए हमें सबसे पहले इतिहास को समझना होगा, मानव की उत्पत्ति को समझना होगा।
मनुष्य की उत्पत्ति व विकास की शुरुआत आज से साठ लाख साल पहले पूर्वी अफ्रीका में हुई, जब एप या लंगूर या बंदर की एक प्रजाति पेड़ो से उतर कर मैदान पर आ जाती है। धीरे-धीरे इन वानरों का विकास हुआ और वो चार पैरों की जगह दो पैरों पर चलने लगे। उनकी इस क्षमता को बाई-पिडल लोकोमोशन (Bipedal locomotion) कहा गया। और इन दो पैरों पर चलने वाले एप को होमोनिन्स (Homonins) कहा गया, जो सभी मानवों के पूर्वज बने।
बाद में ये होमोनिन्स तीन अलग-अलग प्रजातियों में बंट गए।
१। होमो इरगेस्टर, (Homo ergaster)
२। होमो इरेक्टस (Homo erectus )
३। होमो हैबिलस (Homo habilus)

आज से लगभग २५ लाख साल पहले इन्ही होमोनिन्स या मनुष्यों के पूर्वजों ने पत्थर से टूल्स या औजार बनाना शुरु किया। अर्थात् ये समय मनुष्य का पाषाण काल था। जो लगभग ३ हजार बी. सी तक चला या आज से लगभग ५ हजार साल पहले तक चला। मनुष्यों के इस विकास क्रम को हम तीन भागों में बांटते हैं।
१। पुरा पाषाण काल (paleolithic) –
२५ लाख साल से २८ हजार साल पहले तक। मनुष्य नदियों के किनारे रहते थे। वो भ्रमण व शिकार करते थे।
२। मध्य पाषाण काल (Mesolithic) –
२८ हजार साल पहले से ८ हजार साल पहले तक। मनुष्यों ने जानवरों को पालतू बनाना शुरु किया। पुर्नजीवन में विश्वास शुरु हुआ। शव को सामग्री के साथ दफनाना शुरु हुआ। ४०००० साल पहले के दफनाने के प्रमाण मिले हैं। नदियों के किनारों के साथ-साथ जंगलो या पहाडों पर रहना शुरु किया।
३। नव पाषाण काल (Neolithic) –
८ हजार साल पहले से ५ हजार साल पहले तक। कृषि की शुरुआत हुई। इसकी शुरुआत, कश्मीर व स्वात वैली तक में मिली है। इसके अलावा बलूचिस्तान, गंगा के बेसिन व साउथ इण्डिया के उन्तूर में प्रमाण मिले हैं।

लगभग दस लाख साल पहले होमो इरगेस्टर और होमो इरेक्टस अफ्रीका से बाहर निकलने लगे। और धीरे-धीरे सारे विश्व में फैल गए।
भारत में ५ लाख साल पुराने पत्थर के औजार और २.५ लाख साल पुराने नर्मदा में फॉसिल्स मिले है, जिससे इसकी पुष्टि होती है कि होमो इरेक्टस यहाँ पाँच लाख साल पहले मौजूद थे।
इस प्रकार भारतीय उपमहाद्वीप का पहला मनुष्य एक होमो इरेक्टस वानर था, जो नर्मदा वैली के आस-पास पाए जाने के कारण नर्मदा मैन कहलाया। नर्मदा भारत की सबसे प्राचीन नदी भी मानी जाती है। और इसी के उत्तर में अरावली पर्वत श्रेणियाँ सबसे प्राचीन पहाड़। ये हिमालय के पहाड़ों से प्राचीन हैं, क्योंकि हिमालय का निर्माण आज से ४ से ५ करोड़ साल पहले, अफ्रीका के एक टुकड़े के एशिया के इस भाग से आकर मिल जाने के कारण हुआ, जिसका नाम भारतीय उपमहाद्वीप पड़ा, जबकि ये नदी और अरावली पर्वत उसके पहले से जमीन के इस टुकड़े पर विद्यमान थे।
लेकिन हम जिस प्रजाति से ताल्लुक रखते हैं वो होमो इरगेस्टर या होमो इरेक्टस नही है, बल्कि वो हैं होमोसेपियन्स।
होमोसेपियन्स प्रजाति का विकास लगभग ४ लाख साल पहले हुआ। ऊपर की दी हुई तीनों प्रजातियों का आज नामो निशान नही है। होमोसेपियन्स प्रजाति का विकास भी अफ्रीका में हुआ। लगभग ७० हजार साल पहले होमोसेपियन्स अफ्रीका से निकल कर सारे विश्व में फैलने लगे। और १० हजार साल पहले होमो स्पेशिज की एक ही प्रजाति पृथ्वी पर बची रह गई और वो थी होमोसेपियंस। अन्य सभी प्रजातियाँ विलुप्त हो गई। इसका प्रमुख कारण ये माना जाता है कि होमोसेपियंस जहाँ गए, वहाँ पर भोजन, क्षेत्र के लिए हुई लड़ाई में उन्होनें वहाँ की पहले से रह रही प्रजातियों को मार डाला या वो लड़ाई में समाप्त हो गए।
अर्थात् जगहों को जीतने व उसके लिए कत्लेआम की शुरुआत होमोसेपियंस के समय से ही हो गई थी।

लगभग ५० हजार साल पहले होमोसेपियन्स का एक समूह भारत में मिडिल इस्ट या पश्चिम एशिया होते हुए प्रवेश करता है। एक दूसरा होमोसेपियंस का समूह लगभग ३० हजार साल पहले अरब सागर से होते हुए दक्षिण भारत में प्रवेश करता है। इन सारी चीजों की विस्तृत जानकारियों के लिए नेशनल जियोग्राफी का जीनोग्राफी प्रोजेक्ट देख सकते हैं।
तो जिन होमोसेपियंस की हम संतान हैं, वो कहां- कहां, कब-कब फैले, वैज्ञानिक मान्यताओं के अनुसार उसकी एक बानगी यहां प्रस्तुत है।
१। अफ्रीका में पनपे – २ लाख साल पहले
२। अफ्रीका छोड़कर इथोपिया व यमन को जोड़ने वाले मार्ग पर आए – ७५००० साल पहले
३। दक्षिण एशिया – ५०००० साल पहले
४। आस्ट्रेलिया – ४६००० साल पहले।
तो क्या वो समुद्र पार करना जानते थे? वैज्ञानिकों का मानना है कि आज से ११ हजार साल पहले समुद्र ११० मीटर तक नीचे था और दक्षिण पूर्व एशिया एक भू-भाग था, जो आज इण्डोनेशिया, जावा सुमात्रा आदि द्वीपों में बंटा हुआ प्रतीत होता है, और वो सुंदा के नाम से जाना जाता था और जुड़ था। आस्ट्रेलिया भी ज्यादा उथला था और वो साहुल के नाम से जाना जाता था। इन दोनों द्वीपों के बीच समुद्र का पाट सिर्फ ९० कि.मी का था। इसलिए होमोसेपियंस आस्ट्रेलिया पहुंच सके।
होमो इरेक्टस कभी भी आस्ट्रेलिया नही पहुँच पाए, वो सिर्फ दक्षिण एशिया तक पहुँचे, लेकिन होमो सेपियंस आस्ट्रेलिया पहुँच गए, इससे ये प्रतीत होता है कि होमोसेपियंस की जो प्रजातियाँ आस्ट्रेलिया पहुँची उन्हें पानी पर आवागमन का ज्ञान था।
५। यूरोप – ४३००० साल पहले
६। ईस्ट एशिया – ३०००० साल पहले
७। अमेरिका – ३० से २४ हजार साल पहले

११५०० साल पहले पृथ्वी का अब तक का सबसे आखिरी आईस एज खत्म हुआ। इससे नई रहने योग्य जमीन बाहर आ रही थी।
इसके बाद शुरुआत हुई सिविलाईजेशन की, अर्थात् शहरी जिन्दगी व सभ्य ता की।
लगभग दस हजार साल पहले सभ्यआताओं के विकास के बीज पड़ना शुरु हो गये थे, जिसका पहला उदाहरण नाटूफियन सभ्यनता (Natufian culture) है। जो इजरायल व अरब के आसपास का क्षेत्र है, पर ये ग्रामीण सभ्यrता थी। पर पहली पूर्ण विकसित सभ्यसता जहाँ खेती की जाती थी, नगर बसाये गये थे वो सुमेर की सभ्ययता या मेसोपोटामिया की सभ्येता मानी जाती है।
इतिहासकार ये मानते हैं कि अलग-अलग जगहों पर जैसे भारत, चीन, ईरान, ग्रीस, नील इत्यादि के पास सभ्य-ताओं का विकास अलग-अलग व स्वतंत्र रुप से हुआ।
पर मुझे ऐसा लगता है कि चीजो के स्वतंत्र रुप से विकसित होने या आविष्कार होने में लाखों, हजारों साल लग जाते हैं, जैसा कि पत्थर के औजार बनाने, अग्नि पर नियंत्रण, व लोहे के औजार बनाने के क्रम में हुआ। अगर हम एक दूसरे को देख कर या पूर्व आविष्कारित चीजों को देखकर सीखते हैं और किसी नई चीज का आविष्कार करते हैं, तो वो जल्दी होता है। जैसा कि हम आज के समय में देखते हैं। तो लगभग हजार साल के अन्तर में ही विश्व के विभिन्न्न जगहों पर सभी को लगभग एक जैसा ज्ञान हो जाना सम्भव नही दिखता। पर ये जरुर सम्भव दिखता है कि लोग एक जगह से दूसरी जगह जाते रहे हो, जैसा कि उस समय प्रचलन में भी था, और थोड़ा-थोड़ा इस प्रकार ये ज्ञान फैलता गया हो और अन्य जगह भी सभ्यडताओं का विकास शुरु हो गया हो।
तो ये सम्भव दिखता है कि या तो नाटूफियन सभ्य‍ता से लोग बढ़ते व बिखरते चले गए हों और वहाँ सभ्यओताओं का विकास किया हो। या ये भी हो सकता है कि लोग ज्यादा नही, बल्कि कुछ ही माइग्रेट हुए हों, और अलग-अलग जगहों पर रहने वालों ने एक दूसरे को देख कर सीखा हो।
पर जिस तरह की कहानियाँ प्रसिद्ध हैं, एक दूसरे की सभ्यिताओं में, उससे ऐसा प्रतीत होता है कि नाटूफियन सभ्यिता से ही कुछ वर्ग ग्रीस की तरफ बढ़े, कुछ नील की तरफ और कुछ मेसोपोटामिया या ईरान की तरफ। फिर मेसोपोटामिया से अलग होकर कुछ लोग और आगे बढ़े हो और हुंज, स्वात व कश्मीर वैली की तरफ या भारत के हड़प्पा और मोहनजोदाड़ों या चीन की सभ्यडता के प्रेरक बने हों। इस प्रकार बाद में विकसित होने वाली अन्य सभ्यहताएं विश्व के कई कोनों में बिखर गई हों।

वैज्ञानिकों ने सभ्यिताओं के विकास का जो क्रम माना है, वो इस प्रकार है।
१। ११७०० साल पहले –
आखिरी हिम युग समाप्त।
२। ११०००-५००० हजार साल पहले –
खेती शुरु हुई। पश्चिम एशिया या अरब व इजरायल के आस-पास। नाटूफियन सभ्य ता बनी। नोमेडिक से एक जगह ठहर कर रहने लगे, गाँव जैसे हालात में।
३। ४५०० बी.सी अर्थात् ६५०० साल पहले –
सुमेर की सभ्यबता। नाटूफियन सभ्यसता का विकसित रुप। सुमेर की सभ्यबता में एनिल (enil) को वायु देव, एनकी enki को पानी का देवता, ninhursag निन्हुर्सग को पृथ्वी देव, उट utu को सूर्य देव और उसके पिता नन्नास nanna को चन्द्र देव माना गया है।
४। ४००० बी.सी अर्थात् ६००० साल पहले –
मेसोपोटामिया की सभ्य.ता जो आज के अरब, इरान बार्डर पर पड़ती है। और सुमेर सभ्यता के काफी करीब है। ये पहली सभ्य ता थी जहाँ नगर बसाये जाने लगे। वास्तव में जो मूर्ति पूजा या देवताओं को कपड़ा पहनाने, भोग चढ़ाने, इनके लिए पुजारी की व्यवस्था, देवताओं की मूर्तियों को युद्ध में ले जाने, उनके स्वर्ग में रहने इत्यादि की शुरुआत इसी सभ्य ता से हुई। इस सभ्ययता में लगभग ३००० देवी देवता माने जाते हैं। वरुण देव, कामधेनु गाय इस सभ्यलता में भी पाई जाती है।
५। ३३०० बी.सी अर्थात् ५५०० साल पहले –
सिंधु नदी की सभ्य ता या इण्डस वैली सिविलाईजेशन। ज्यादा तर पशु व वृक्ष, यम, आकाश व सूर्य की पूजा करते थे। योगा के मुद्रा में बैठे एक व्यक्ति का चित्र मिला है, जो शिव हो सकते हैं। मतलब ये नाटूफियन या सुमेर से अलग हुए थे न कि मेसोपोटामिया से।
६। ३१०० बी.सी अर्थात् ५२०० साल पहले –
मिश्र की सभ्यबता
७। २००० बी.सी अर्थात् ४१०० साल पहले –
ग्रीस की सभ्यबता, ज्यूज की पूजा जिसे इन्द्र के रुप में माना।
८। १६०० बी.सी अर्थात् ३६०० साल पहले –
चीन की सभ्यबता
९। १२०० बी.सी अर्थात् ३२०० साल पहले –
अमेरिका की सभ्य‍ता

इस क्रम से भी यही लगता है कि सभ्य ताओं का क्रमिक विकास हुआ। जो बहुत मुमकिन है, एक सभ्य‍ता के लोगों का आबादी बढ़ने व खाने की कमी या बौद्धिक कारणों से आगे बढ़ना हुआ हो, और वो अपने साथ पुरानी सभ्य ता का ज्ञान लाए हो (कृषि का ज्ञान), तथा कुछ अपना नया ज्ञान उस सभ्य ता के विकास में डाला हो।
ऐसा प्रतीत होता है कि नाटूफियन सभ्य ता से कुछ सभ्यपताएं फैली और आगे बढ़ी। इनमें सुमेर की सभ्ययता व सिन्धु घाटी की सभ्यैता प्रमुख थी। क्योंकि इन तीनों सभ्यधताओं में प्रकृति के अंश अर्थात् वायु, अग्नि, सूर्य, वृक्ष, पत्थर या पृथ्वी की पूजा पाया गया है। फिर सुमेर की सभ्यरता या नाटूफियन सभ्येता ही और फैली और मेसोपोटामिया की सभ्याता का विकास हुआ। मेसोपोटामिया की सभ्यमता में ही सबसे पहले बहुईश्वरवाद, मूर्ति पूजा, ईश्वर के स्वर्ग में रहने, ईश्वर का ध्यान रखने, उन्हें भोग लगाने या कपड़ा पहनाने, उनके लिए पुजारी इत्यादि की व्यवस्था हुई।
इस प्रकार देखते हैं तो बहुईश्वर वाद का प्रारम्भ पहले हो गया था। सबसे पहले जिसने एक ईश्वर वाद की बात की वो बाईबल की ओल्ड टेस्टामेंट या यहूदियों की बाईबिल थी, जिसके अनुसार सबसे पहले यहोवा या एक ईश्वर की पूजा प्रारम्भ हुई।
इससे पहले सिर्फ ऋगवेद में ईश्वर के आकार रहित होने की बात कही गई थी।
ऊपर लिखे समय को ध्यान में रखना जरुरी है, जिससे ईश्वर के क्रमिक विकास को समझा जा सके।

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ईश्वर की उत्पत्ति
ईश्वर की उत्पत्ति मनुष्य ने ही की अर्थात् मनुष्य ने ही ईश्वर को बनाया है। यदि वास्तव में ईश्वर होता तो पशु भी उसकी पूजा करते। पर ईश्वर की अराधना तो सिर्फ मनुष्य ही करते हैं। और मनुष्य भी तब तक ईश्वर की पूजा नही करते थे, जब तक वो पशु थे, उन्होंने तब पूजा शुरु की जब उनमें बुद्धि का विकास हुआ, जब उन्होने धर्म बनाए।

धार्मिक लेखन का समयकाल –
BC – यीशु से पहले & BCE – सर्वमान्य युग प्रारम्भ से पहले (BC & BCE एक ही हैं), C- Century

१। २५०० BC – ४५०० साल पहले – पिरामिड के लेखन
को सबसे पुराने धार्मिक लेखन के रुप में माना जाता है।
२। २२०० BC – ४२०० साल पहले – Minoan सभ्य।ता,
इस सभ्ययता में अनेकों ईश्वर की पूजा की जाती थी। जिनमें पृथ्वी, साँप, बैल व चिडि़या को भगवान माना गया।
३। २१५० BC – ४१५० साल पहले -“Sha naqba imuru’ or
‘Shutur eli sharri” सुमेर सभ्यसता में लिखे गए सबसे प्राचीन ग्रंथ।
४। १७०० – ११०० BC – ३७०० वर्ष पहले- वेद काल। पहला
वेद ऋगवेद लिखा गया। रुद्र, ब्रम्हा व विष्णु का वर्णन ऋगवेद में आता है।
५। १३०० – ६०० BC – २३०० वर्ष पहले – यहूदी
६। १२५० – ६०० BC – ३२५० साल पहले- उपनिषद काल
७। ८७७ – ७७७ BC – २८७७ साल पहले- जैन तीर्थकर
८। ८००-६०० BC – २८०० साल पहले –
Chandogya चन्दोग्य उपनिषद में कृष्ण का प्रथम बार वर्णन
९। ६०० BC – २६०० साल पहले – zorastrian जरथुस्त्र
१०। ५२७ BC- २५२७ साल पहले – महावीर का समय
११। ५६३ BC – २५६३ साल पहले – बुद्ध
१२। ५५१ BC – २५५१ साल पहले – कन्फूशियस
१३। १st C – २००० साल पहले – ईसाई धर्म
१४। ५७० C- ६३२ C-१४०० साल पहले –
Muhammad ibn abdullah, मुहम्मद इब्न अब्दुल्लाह का समय। कुरान लिखा गया। इस्लाम की शुरुआत।
१५। १४६९ – १५३९ C – ५०० साल पहले – सिख धर्म।

इस हिसाब से प्रमुख धर्म जो आज मौजूद हैं वो जिस क्रम में आए वो इस प्रकार हैं।
१। वैदिक या सनातन धर्म –
पहली बार ईश्वर के आकार रहित होने की बात कही गई व आत्मा तथा परमात्मा को माना गया। आत्मा, ईश्वर का वो भाग जो सभी मनुष्य में है और परमात्मा, जहाँ सबकी आत्मा जाकर मिल जाती है। ये परिकल्पना वैसी ही है, जैसे आज बिजली के छोटे-छोटे टुकड़े किसी खिलौने को चलाते हैं और फिर मुख्य विघुत (ट्रांसफार्मर) में जाकर मिल जाते हैं।
२। यहूदी –
ये एक ईश्वर यहोवा को ही मानते हैं, पर इनके धर्म की शुरुआत मूसा के समय से हुई, अर्थात् लगभग ३२०० साल पहले। मगर मूसा के पहले अब्राहम वगैरह भी यहोवा नामक एक ईश्वर को मानते थे। इनकी कहानियाँ बाईबल की ओल्ड टेस्टामेंट में मिलती हैं।
३। जोराष्टि्रयन –
६०० बी.सी अर्थात् २६०० वर्ष पहले। मेसोपोटामिया की पूर्ण विकसित सभ्य.ता, जिसे ईरान की सभ्येता भी कहते हैं कई छोटे-छोटे कबीलों में या राजा महाराजाओं में बँटा था। इन्हें देवास कहते थे। जो लगभग ३००० छोटे-बड़े देवताओं की पूजा मूर्ति के रुप में किया करते थे। देवास को हरा कर सायरस ने ईरान के पहले साम्राज्य एकमिनिड (Ahaemenid) साम्राज्य की स्थापना की, जो इजरायल से हुंज वैली या सिन्धु सभ्यसता तक फैला था। इसे इरान का या विश्व का पहला विस्तृत साम्राज्य कह सकते हैं। ये अहुर कहलाए। अहुरा-मजदा इनके देवता कहलाए। यहीं से देव व असुर की सम्भवतः शुरुआत हुई।
४। बौद्ध – ४८० बी सी अर्थात् २४८० साल पहले
५। ईसाई – २००० साल पहले
६। इस्लाम – १४०० साल पहले और ११०० साल पहले
भारत आया।
७। हिन्दू – Indu या Hindoo हिन्दू शब्द ६०० बी.सी पूर्व अर्थात् २६०० साल पहले ग्रीक व पर्सियन अर्थात् ईरान के लोगों द्धारा सिन्धु नदी के इस तरफ भारतीय उपमहाद्विप में रहने वाले लोगों के लिए किया गया। राजा डैरियस ने इसका साफ-साफ प्रयोग किया पर ये सिर्फ एक शब्द ही रहा लगभग पन्द्रहवीं शताब्दी में अर्थात् आज से ५०० साल पहले अमीर खुसरो ने इसका प्रयोग भारत में मुसलमानों को छोड़कर अन्य जातियों के लिए किया और सम्भवतः तभी से ये धर्म के रुप में माना जाने लगा। इसी परिभाषा के अनुसार बौद्ध व जैन भी हिन्दू ही माने जाते हैं।
इस प्रकार सनातन धर्म को पहला सुनियोजित धर्म माना जाता है।
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ईश्वर की पूजा की शुरुआत
अब हम विचार करते हैं कि यहाँ तक के ईश्वर की पूजा की शुरुआत क्यों और कैसे हुई?

पत्थर व प्रकृति की पूजा –
उपरोक्त साक्ष्यों से ये तो स्पष्ट है कि ६० हजार साल पहले तक, जब हम अन्य पशुओं की तरह थे, ईश्वर की पूजा नही करते थे। आज भी कोई भी पशु ईश्वर की पूजा नही करता या ईश्वर को नही मानता। कुछ एक जो उदाहरण दिए जाते हैं वो पशु द्धारा मनुष्यों की नकल मात्र हैं।
होमो इरेक्टस आग को इस्तेमाल करना जानते थे। मेसोलिथिक काल में अर्थात् २५ हजार से ८ हजार साल पहले लोगों को दफनाना व उससे जुड़ा धार्मिक कर्मकाण्ड शुरु हो गया था।
तुर्की के दक्षिण में Gobekli tepe नाम का एक मंदिर मिला है जो ११६०० साल पुराना माना जाता है। यहाँ सिर्फ कुछ ऊँचे पत्थर क्रम में सजा कर रखे गए हैं। जो ये इंगित करते हैं कि पत्थर के पूजा की शुरुआत मंदिर के रुप में हो गई थी। यही अब तक का मिला मंदिर का पहला प्रमाण है। मगर उस समय किसी मानवीय देवता, शिव, विष्णु, इन्द्र, यहोवा या अहुरा-मजदा या किसी भी मानव देवता का वर्णन नही मिलता। न ही उनकी पूजा होती थी।
ईश्वर की पूजा कैसे शुरु हुई ये पूरी तरह से ठीक- ठीक कहना तो मुश्किल है। लेकिन १० हजार साल पहले या उससे भी थोड़ा पहले सभ्यहता के बीज पड़ने के साथ-साथ मनुष्य ने सोचना शुरु किया होगा, कि वो कैसे बना, ये सारी पृथ्वी, ये ब्रम्हाण्ड जो आकाश में दिखाई दे रहा है, वो सब क्या है? तो फिर उसने सूरज, चन्द्रमा जैसी चीजों को या अग्नि या पत्थर जिससे वो डरता भी था, और जिसका उपयोग भी अपने फायदे के लिए करता था, ऐसी चीजों को उसने ईश्वर समझा। उसके बाद उसने अपने काम में आने वाली चीजों की पूजा शुरु की होगी, जैसे पत्थर, अग्नि, बादल, नदी, पशु इत्यादि। जिसके प्रमाण मिनोन व सुमेरियन सभ्यनता में मिले हैं।
अर्थात् इस समय के आसपास ही सबसे पहले मनुष्य ने प्रकृति पूजा करना आरम्भ कर दिया। प्राकृतिक घटनाओं जैसे ज्वालामुखी, वर्षा, बिजली कड़कना, बादल, बर्फ के पहाड़ का टूटना, आंधी इत्यादि को ही उसने दैविक घटना समझा।

मानवीय ईश्वर की पूजा –
फिर सभ्यशता का विकास हुआ और परिवार व समाज का। परिवार की रक्षा पुरुष करता था, इसलिए पुरुष प्रधान समाज की नींव तो पड़ चुकी थी। जो लोग अब तक निडर थे, कम डरते थे वो परिवार, सुरक्षा व स्थायित्व मिलने की वजह से अब और डरने लगे। अब डर उनमें बढ़ने लगा। अब वो गांव जैसे माहौल में झुण्ड व कबीलों में रहने लगे। अब इस झुण्ड के संचालन व रक्षा की जिम्मेदारी भी किसी पर आई होगी। तो उनमें से एक व्यक्ति सामने आया होगा और उसने अपने कबीले की रक्षा की होगी। अब वो चाहे पशु से हो या दूसरे कबीले से और यही व्यक्ति पहला मुखिया बना होगा, जिसने धीरे-धीरे बढ़कर कालान्तर में राजा का रुप ले लिया। कबीले के मुखिया के रुप में पूजे जाने वाले एक व्यक्ति का पहला उदाहरण मुझे शिव के रुप में समझ में आता है।
ज्वालामुखी, सुनामी, आकाशगंगा, सूर्य, चन्द्र इत्यादि इतनी प्राकृतिक घटनाएं थीं, जिन्हें उस समय के मनुष्य के लिए समझना मुमकिन नही था। ऐसी चीजों को उन्होनें ईश्वर माना, जिसका मुख्य कारण डर था। अब उस समय इन घटनाओं को ही जिन्होनें अपनी तरह से इस्तेमाल कर लिया वो उनका खुदा बन बैठा। अब जिस व्यक्ति या समुदाय ने अग्नि को नियंत्रित कर उसका प्रयोग किया होगा, तो उस समय के लोगों के लिए तो ये एक बड़ा चमत्कार होगा। उन्होनें अवश्य ही उसे ईश्वर समझा होगा। और शायद ऐसे ही किसी व्यक्ति का नाम अग्नि देव या एनिल पड़ गया होगा। हर किसी के लिए ये सोचना आसान था कि जो दैविक प्रकोपों को झेल ले रहा है या उनकी रक्षा उससे कर रहा है वो अवश्य ही भगवान होगा।
ऐसे व्यक्ति अवश्य ही उन लोगों से थोड़ा ज्यादा बुद्धिमान रहे होगें और उन्होनें अन्य लोगों को या तो बेवकूफ बनाया या जितना उनकी समझ में आया वैसी उन्होनें उसकी व्याख्या की। ऐसी चीजों को ही लोगों ने चमत्कार समझा। ऐसा ही आजकल भी हो रहा है। कोई साधु या फकीर आता है, विज्ञान की मदद से, जादू के ट्रिक सीखकर लोगों को बेवकूफ बनाता है। अब आम जनता तो जानती नही। वो उसे चमत्कारी बाबा मानने लगती है। जब आज के समय में इतने सूचना के संसाधन मौजूद हैं, तब भी लोग आशा राम और ऐसे ही अनेको संत महात्मा के लाखों लाख अनुयायी बन जाते हैं, तो फिर उस समय ऐसे चमत्कारी व्यक्ति को भगवान मानने या उसकी उपासना करने में आम लोगों को क्या परेशानी हो सकती थी। आज जब सूचना के इतने साधन मौजूद हैं तब लोगों को बेवकूफ बनाना इतना आसान है तो उस समय तो कितना ज्यादा आसान रहा होगा।
इसके कुछ अन्य उदाहरण बाद के समय में मिलते भी हैं। उन कुछ लोगों ने जिन्होनें आम लोगों को प्राकृतिक आपदाओं से बचाया वो भगवान बन गए। इसका एक सीधा सा उदाहरण कृष्ण के रुप में मिलता है, जिन्होनें गोवर्धन पर्वत में अपने गांव वालों को शरण देकर उन्हें वर्षा से बचाया। इसी के उपरान्त उन्होनें इंद्र की पूजा बन्द करवा दी, और अपनी पूजा आरम्भ करवाई। उन्होनें सम्भवतः सिर्फ एक स्थान ढूंढा वर्षा से बचने का और कहानी में ये कहा जाने लगा कि उन्होने गोवर्धन पर्वत उठा लिया। इसी प्रकार मूसा ने मिस्र से इजरायल जाने का रास्ता समुद्र्र के बीच से ढूंढा और कहानी में ये कहा गया कि समुद्र दो फांक में बँट गया और यहोवा की कृपा से समुद्र के बीच में जमीन निकल आई। मूसा वहीं से पैगम्बर बन गए। इसी प्रकार रामायण में भारत से श्रीलंका तक पुल नल-नील ने बनाया और ये कहा गया कि राम के स्पर्श से पत्थर तैरने लगे। इसी तरह की कुछ सच्चाई के साथ, कई कहानियाँ हमारे धार्मिक ग्रंथों में मौजूद है। ऐसा इसलिए था क्योंकि उस समय के लोगों को इतना वैज्ञानिक ज्ञान नही था। कहानी के माध्यम से जो उन्हें समझाया गया, उन्होने मान लिया। पर तरस तो तब आता है, जब आज भी शिक्षा के आभाव में ऐसा ही लोग मानते हैं।
इस प्रकार मनुष्य व राजाओं की पूजा उनकी शक्ति, बल, अत्याचार या उनके कबीले को पोषण करने वाले और अत्याचारियों से बचाने के कारण शुरु हुई होगी और वही बढ़ती चली गई।
मेसोपोटामिया की सभ्य ता में हमें जो लगभग ३००० देवताओं के प्रमाण मिलते हैं, वहीं से व्यक्ति पूजा और मूर्ति पूजा का आरम्भ हुआ। तो जो भारतीय मूर्ति पूजा करते हैं वो वास्तव में मेसोपोटामिया या ईरान की सभ्य ता का पालन कर रहे हैं।
जबकि वैदिक लोग वास्तव में सुमेर की प्राकृतिक सभ्य‍ता का पालन कर रहे थे, पर सुमेर सभ्य ता के लोगों ने ईश्वर के एकेश्वरवाद या आकार रहित होने की परिकल्पना नही की थी। ऋगवेद ने ही सबसे पहले ईश्वर को आकार रहित कहा। तो जो मुसलमान खुदा को आकार रहित कहते हैं, वो वास्तव में वैदिक सभ्यकता का पालन कर रहे होते हैं।
तो इस प्रकार ईश्वर की पूजा का पहला कारण तो मनुष्य की जिज्ञासा थी। इस संसार को किसने बनाया? इस जिज्ञासा ने अलग-अलग तरह से सोचना शुरु किया और जो जिसकी समझ में जैसा आया, वैसी परिकल्पना उसने दी। सामने उसे सूर्य और चन्द्रमा दिखाई दिए, जिसे समझना और उस तक पहुँच पाना मनुष्य के लिए उस समय सम्भव नही था, तो मनुष्यों ने इन्हें ही ईश्वर मान लिया।
दूसरा कारण था लालच। लालच इस तरह की जो भी चीज मनुष्यों को अपने फायदे की लगी या अपने उपयोग की लगी, उसकी वो उपासना करने लगे और उसे ही देवता मान लिया। जैसे अग्नि, गाय, बैल, नदी, पेड़, पृथ्वी इत्यादि।
तीसरा प्रमुख कारण था डर। डर कि अमुक चीज हमसे बहुत शक्तिशाली है, इसलिए मनुष्यों ने ऐसी चीजों के सामने समर्पण किया। जैसे अग्नि, भूत- प्रेत, नाग, शिव, यहोवा प्राकृतिक आपदा जैसे आंधी, तूफान, बर्षा, बिजली, बादल का गरजना, ओला वृष्टि या उल्कापिंड के टूटने से अग्नि- वर्षा इत्यादि।

आज के समय में जानकारी बढ़ने से प्राकृतिक डर का भाव तो कम हुआ है पर लालच का बढ़ गया है। अब वो चाहे स्वर्ग का लालच हो या मोक्ष का।
इस तरह से प्रकृति पर नियंत्रण करके मनुष्य की पूजा आरम्भ हुई। उन्होनें विचारना शुरु किया और अलग-अलग भगवान व धर्म की स्थापना हुई ।

तो मैने पहला वाक्य जो कहा कि “ईश्वर एक समीकरण है, जो साल्व नही किया जा सकता, जब कभी ये साल्व होगा तो वो ईश्वर नही रह जायेगा।” वो यहाँ सच प्रतीत होता है।
जब तक मनुष्य के पास समझ नही थी वो ईश्वर नाम के समीकरण को साल्व नही कर पा रहा था और प्राकृतिक चीजों को ही उसने ईश्वर समझा। जब उसे पता चल गया कि ये सिर्फ प्राकृतिक घटनाएं हैं और इनसे बचा जा सकता है तो ईश्वर नामक इस समीकरण के साल्व होते ही वो चीजें ईश्वर नही रह गई। और नया ईश्वर बन गया, वो था मनुष्य।
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धर्म का उदय

वैदिक धर्म या सनातन धर्म –
ये धर्म का पहला संगठित रुप था, या जिसकी पुस्तकें मौजूद हैं, जिसे धर्म के रुप में शब्दनिष्ठ किया गया, जिसे धर्म के रुप में क्रमबद्ध किया गया। इसके पहले किसी भी धर्म के संयोजित लिखित प्रमाण उपलब्ध नही हैं। उसके पहले धर्म व्यवस्थित रुप में, संगठित रुप में नही थे। अलग-अलग अनेकों मान्यताएं थीं, जो जिसे चाहे पूजा करता था और इस प्रकार हजारों देवता बन गए थे। ईश्वर या परमात्मा को परिभाषित करने व उसके पूजा की विधि सर्वप्रथम वेदों में दिखाई देती है। इसके साथ ही मानवीय आचरण को भी धर्म के अनुसार वेदों ने परिभाषित किया।
वेद वास्तव में मेसोपोटामिया की सभ्यसता का एक भाग हैं। हो सकता है कि वेद के पहले भी मेसोपोटामिया की सभ्यकता में संगठित धर्म का विकास हुआ हो, पर उसके प्रमाण मौजूद नही हैं।
वेद श्रुतियों व स्मृति पर आधारित हैं। अर्थात् जो पहले घट चुका था, उस सुनी सुनाई बातों को वेदों में लिखने का प्रयास किया गया। इसलिए इस बात की पूरी सम्भावना है कि जो वास्तविकता रही हो, उसमें काफी मिलावट आ गई हो। इसी कारण वेदों में लिखी कई घटनाएं ईरान व उसके आस-पास की सभ्यकताओं व घटनाओं से सम्बन्धित हो सकते हैं। जैसे कामधेनु गाय का वर्णन दोनों सभ्यमताओं में आता है।
पूर्ण विकसित मेसोपोटामिया की सभ्यकता या उस सभ्यसता को जीत कर बने एकमिनिड साम्राज्य का मानचित्र देखेगें तो पायेगें ये हुंज वैली तक फैली हुई थी। तो जो लोग हुंज वैली की तरफ थे, वो वैदिक लोगों के प्रथम चरण के लोग थे। वेदों के शुरु होने के पहले ही अग्नि, इन्द्र, वायु, इत्यादि की पूजा आरम्भ हो गई थी। अग्नि, इन्द्र, वायु इत्यादि की पूजा सुमेर की सभ्यअता में भी मिलते हैं, जिससे ये प्रतीत होता है कि वैदिक लोग सुमेर की सभ्य ता के बाद ही उनसे अलग हो गए थे, क्योंकि उनमें सुमेर के बाद विकसित मेसापोटामिया की सभ्यकता में पूजे जाने वाले कई देवों का वर्णन नही मिलता। बाद में असुरों से हारे कुछ और देव आकर इन्हीं में मिल गए हों, इनमें वरुण देव ऐसे ही लगते हैं। वेदों ने इन्हें देव कहा, परमात्मा का अंश कहा, पर ईश्वर या परमात्मा नही। देव व ईश्वर में अंतर है। देव अकेमिनिड सभ्य ता के पहले ईरान या मेसोपोटामिया में रहने वाले लोगों को कहते थे।
ऋगवेद पढ़ने पर भी ऐसा लगता है कि जैसे इन्द्र, वरुण, अश्विनीकुमार इत्यादि के रुप में राजाओं को सोमरस पान के लिए या तो आमंत्रित किया जा रहा है या इनकी बड़ाई की जा रही है, जिससे उनसे दान मिल सके।
वेद में कई मण्डल हैं व उन मण्डलों के अन्दर कई सूक्त। कई तो पूरे-पूरे सूक्त ऐसे प्रतीत होते हैं कि जैसे हम कहते हैं भई! आज शाम को दारु की पार्टी है, चले आना। वैसे ही ये सूक्त निमंत्रण पत्र की तरह लगते हैं जो विभिन्न्न अवसरों पर लिखे गए हों, कि हे राजा इन्द्र! आज शाम को सोमरस पीने के लिए आ जाना। या राजा वरुण, या इन्द्र अपने मित्र अग्नि या पत्नी के साथ यज्ञ व उसके बाद सुबह-शाम के सोमरस पान के लिए आ जाना।
पर ईश्वर वो था, जिसने सम्भवतः सम्पूर्ण ब्रम्हाण्ड की रचना की होगी। तो ऐसे ईश्वर को वेदों ने परमात्मा के रुप में आकार रहित कहा।

नासदासीन्नो सदासीत् तदानी नासीद्रजो नो व्योमा परो यत्। किमावरीवः कुह कस्य शर्मन्नम्भः किमासीन्द्रहनं गभीरभ्।।

मगर बाद में लोगों ने देवों की पूजा आरम्भ कर दी और ईश्वर को इन्हीं देवों में देखने लगे।
अब तक के जो प्रमाण मिलते हैं उसमें वेदों ने सबसे पहली बार ईश्वर को आकार रहित कहा।
तो हम वैदिक सभ्याता की बात करें या मोहनजोदाड़ों, हड़प्पा की, विश्व की सभी सभ्ययताएं व सभी ईश्वर मध्य एशिया से ही प्रारम्भ हुए हैं।

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यहूदी

बाईबल का ओल्ड टेस्टामेंट यहूदियों से ताल्लुक रखता है और वो यहूदियों की बाईबल या यूँ कहें यहूदियों का इतिहास है।
ओल्ड टेस्टामेंट की भी काफी बातें मूसा के पहले की हैं, और अथर्ववेद के पहले ऋगवेद आया और वो भी श्रुतियों पर आधारित है। तो यहूदी और वैदिक धर्म लगभग साथ साथ चले हैं। दोनों ने ईश्वर के रुप में एक ईश्वर की कल्पना की है। मेसोपोटामिया की सभ्यगता के पश्चिम छोर अर्थात् इजरायल में यहूदियों ने जहॉं यहोवा के रुप में ईश्वर को मानवीय आकार दिया एक ईश्वर के रुप में, इसी सभ्याता के पूर्वी छोर पर अर्थात् हुंज व कश्मीर वैली के आसपास वेदों ने उसे आकार रहित कहा।
ऋगवेद व उसके बाद तक भी धर्म, ईश्वर व पूजा तक ही सीमित रहा और राजा की इच्छा ही कानून होती थी, जिसका पालन प्रजा करती थी।
पर अथर्ववेद ने, व मूसा ने धर्म को आम मनुष्य के सामाजिक जीवन में हस्तक्षेप का हथियार बना दिया। और ये दोनों ही लगभग समकालीन हैं। उन्होनें जो नियम दिए वो मनुष्यों को नियंत्रित करने के सम्भवतः पहले कानून या नियम थे। यूं कह सकते हैं आज के कानून के पहले नींव के पत्थर इनके नियम हो सकते हैं।
इन धर्मों ने आम आदमी को ईश्वर के नाम पर प्रजा का शासक बना दिया। सिर्फ ईश्वर के डर से सारे कबीले के लोगों को नियंत्रित किया जा सकता था। यहाँ कोई राजा अपनी प्रजा को नियंत्रित नही करता था। बल्कि कुछ नियम और उन नियमों को पालन करवाने वाला पण्डित या पुजारी सारी प्रजा को नियंत्रित करता था, इन नियमों के माध्यम से।
इसका फायदा ये भी था, कि अब एक से नियम सबके लिए हो गए। सिर्फ राजा की इच्छा ही कानून नही रह गया।

बेबीलोन की सभ्याता, जो मेसोपोटामिया की सभ्यंता का ही एक भाग माना जाता है, उससे निर्वासित होकर कुछ लोग, इजरायल जाति के रुप में येरुसलेम तथा इसके आसपास के यूदा (judah) नामक प्रदेश में बस गए। इसी कारण इसे Judaism कहा जाता है। ये लगभग ४०००० लोगों का काफिला था, जिनका सरदार था अब्राहम।
अब्राहम एकमिनिड (र्ंhaemenid) साम्राज्य के ऊर प्रदेश में अपने इब्रानी कबीले के साथ रहा करते थे। जहाँ प्रचलित मूर्तिपूजा से व्यथित होकर इन्होने ईश्वर की खोज में अपने कबीले के साथ एक लम्बी यात्रा शुरु की। और यर्दन नदी की तराई के प्रदेश में पहुंचने के बाद एक इजरायली प्रदेश की नीव पड़ी।
हजरत अब्राहम के दो बेटे थे इसहाक और इस्माईल। किन्तु दोनो अलग-अलग माँ से। अब्राहम के पोते का नाम याकूब था जिसने यहूदियों की १२ जातियों को मिलाकर इजरायल बनाया था। याकूब के बेटे का नाम यहूदा या जूदा था। इन्ही के नाम पर ही उसके वंशज यहूदी कहलाए और उनका धर्म यहूदी धर्म।
यहूदी अपने ईश्वर को यहवेह या यहोवा कहते हैं। यहोवा ने इसरायल के लोगों को एक ईश्वर की अर्चना का आदेश दिया। यहूदी मानते हैं कि अपने नियम सबसे पहले इर्श्वर ने हजरत मूसा को सुनाया था। और मूसा ने ही सबसे पहले इस धर्म की बातों को संकलित किया।
हजरत मूसा का जन्म १२०० बी.सी माना जाता है। अर्थात् लगभग ३२०० साल पहले हजरत मूसा को पहले से चली आ रही परम्परा को व्यवस्थित करने के कारण यहूदी धर्म का संस्थापक माना जाता है।
ये माना जाता है कि मूसा को उनकी माँ ने नील नदी में बहा दिया था। उनको फराओ अर्थात् मिस्र के राजा की पत्नी ने पाला था। बड़े होकर वो मिस्री राजकुमार बने। बाद में मूसा को पता चला कि वो तो यहूदी हैं और उनका यहूदी राष्ट्र अत्याचार सह रहा है और यहूदी मिस्र में गुलामों का जीवन जी रहे हैं। तो उन्होने गुलाम यहूदियों को इकठ्ठा किया और उनमें जागृति लाई। मूसा का एक पहाड़ पर ईश्वर से साक्षात्कार हुआ और परमेश्वर की मदद से उन्होनें फराओ को हरा कर यहूदियों को आजाद कराया और मिस्र से पुनः उनकी भूमि इसरायल में यहूदियों को पहुंचाया।
हजरत मूसा ने बताया कि ईश्वर ने उन्हे पहाड़ पर संदेश दिया। पहाड़ ही इसलिए उन्होनें चुना होगा, क्योंकि वहाँ उन्हें कोई देख न सके। अपने सिद्धान्तों को जो उन्होनें अपने पूर्वजों के सिद्धान्तों से सीखा था, उसी को उन्होंने ईश्वर के नाम से प्रचारित किया। यहीं से धर्म में झूठ के बीज पड़ना शुरु हो गये। या ये भी हो सकता है कि जिस घटना को वो समझ न पाए हों उसे देखकर उन्होंने उसे ईश्वर समझा हो।

एक ईश्वर की परिकल्पना, खतना, बुतपरस्ती का विरोध, नमाज, हज, रोजा, जकात, सूदखोरी का विरोध, कयामत, कोशर अर्थात् हराम- हलाल, पवित्र दिन अर्थात् सब्बाब, उम्माह जैसी बाते यहूदी धर्म की हैं। पवित्र भूमि, धार्मिक ग्रंथ, अंजील, हदीस और ताल्मुद की कल्पना एक ही है। ईसाई और इस्लाम में आदम-हव्वा, इब्राहीम, नूह, दावूद, इसाक, इस्माइल, इल्यास, सोलोमन आदि सभी ऐतिहासिक लोग यहूदी परंपरा से ही हैं। हजरत अब्राहम को यहूदी, मुसलमान और ईसाई तीनों अपना पितामह मानते है। बस अंतर इतना है कि मूसा के बाद यहूदियों को आज भी अपने मसीह के आने का इंतजार है, जबकि ईसाईयो ने ईसा को ही आने वाला मसीह मान लिया और ईस्लाम ने मुहम्मद को अपना आखरी पैगम्बर। मूसा के बाद से ही यहूदी अलग-अलग धर्मो में बँटने लगे।

यहूदी मूर्ति पूजा के विरोधी थे। उस समय इनका कोई राजा नही था और प्रधान याजक या पण्डित ही इस समुदाय पर शासन किया करते थे। यहूदी न तो पाप को मान्यता देते हैं, न मूर्ति को, न स्वर्ग को, न पुर्नजन्म को। इसलिए वो वर्तमान में जीने को प्रासंगिक मानते हैं। और अपनी गलती की सजा के लिए इसी जन्म में प्रायश्चित की बात करते हैं।
यहूदियों के अनुसार ईश्वर एक है और इसके अवतार या दूसरे स्वरुप नही हो सकते। परन्तु वो ईश्वर दूत से अपने संदेश भेजता है। यही मान्यता ईसाई व इस्लाम भी मानते हैं। यहूदी धर्म, ईसाई धर्म व इस्लाम दोनों का आधार है। दोनों धर्म इसी धर्म से निकले हैं। एक तरह से कहें तो यहूदी धर्म ईसाई व इस्लाम धर्म का पिता है, पर फिर भी दोनों ही इस धर्म से कितनी ज्यादा नफरत करते हैं, इस हद तक कि वो इस धर्म को मिटा देना चाहते हैं। इसका उदाहरण हम होलोकास्ट व अरब- इजरायल झगड़े के रुप में देखते हैं आज।

अब ओल्ड टेस्टामेंट के इस पूरे प्रकरण को तथ्यों के सन्दर्भ में, मैं कहानी के रुप में समझाता हूं। जितना मैं समझ पा रहा हूँ, सुमेर की सभ्यझता बढ़ कर मेसोपोटामिया की सभ्य ता में बदल गई। अपने पूर्ण विकसित रुप में मेसोपोटामिया की सभ्यूता इजरायल से लेकर हुंज वैली तक फैली हुई थी। इसमें छोटे- छोटे कितने ही राज्य या कबीले थे। और उनके अलग- अलग देवता। इस प्रकार लगभग ३००० देवताओं की वहाँ पूजा होने लगी। इसी समय हुंज वैली के आसपास जो लोग रहते थे उन्होनें वेदों की रचना की और कुछ प्रमुख देवताओं को तो माना पर ईश्वर के रुप में परमात्मा या एक आकार रहित ईश्वर का सिद्धान्त दिया। ये बात हो सकती है मेसोपोटामिया में भी फैली हो। उसके कुछ समय बाद अब्राहम मेसोपोटामिया की सभ्य ता से निकल कर इजरायल की तरफ अपने कुछ लोगों को साथ लेकर बढ़े। वहाँ उन्होनें एक ईश्वर यहोवा व एक माता-पिता आदम व हव्वा के सिद्धान्त की परिकल्पना दी। उसके कई सालों बाद अहुर आए और उन्होनें सबको जीत कर अकेमिनड साम्राज्य की नींव रखी। इन युद्धों को ही सम्भवतः देवासुर संग्राम कहा जाता है। इस युद्ध से मेसोपोटामिया के देव हारकर हुंज के करीब सीमित हो गए और देव संस्कृति की नींव रखी, जिन्हें वहाँ पहले से रह रहे विष्णु का साथ मिला।
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इतनी थ्योरी के बाद हम ये जानने की कोशिश करते हैं कि जिन्हें हम ईश्वर या देवता मानते हैं, वो वास्तविकता के धरातल पर कौन हो सकते हैं?

ब्रम्हा कौन थे।
ब्रम्हा को वैदिक सभ्येता, वेद व हिन्दूओं का जनक या परमपिता माना जाता है। वास्तव में परमपिता का अर्थ प्रथम पिता है। अर्थात् वैदिक लोगों या बाद में जो आर्य कहलाए उनकी शुरुआत ब्रम्हा से हुई।
ऊपर का इतिहास पढ़ने के बाद हम ये अंदाजा लगा सकते हैं कि ब्रम्हा सम्भवतः वो व्यक्ति थे जो नाटूफियन या सुमेर या मेसोपोटामिया की सभ्यवता से अलग होकर आगे बढ़े और स्वात, हुंज या कश्मीर घाटी के आस-पास के क्षेत्रों में आकर ठहर गए। वहीं पर उन्होंने वंश वृद्धि की और उनके वंशज देव या देवी कहलाए।
कोई भी व्यक्ति जो अपने कबीले से अलग हुआ हो, और एक नई खाली जगह पर नए सिरे से अपने वंश की शुरुआत की हो, वहाँ के लोगों के लिए उसे परमपिता या सृष्टि के रचयिता माने जाने में ज्यादा समस्या नही दिखाई देती। इसलिए ही सभी प्राचीन धर्मो में एक व्यक्ति से वंश की शुरुआत या पृथ्वी के बसने की बात आती है।
इस तरह से ब्रम्हा देवी देवताओं व आर्यो के प्रथम पूर्वज साबित हुए न कि ईश्वर।
यहूदियों के देवता यहोवा और ब्रम्हा के बारे में हमें श्रुतियों के माध्यम से ही मालूम है। तो ऐसी वास्तव में भी कोई कहानी हो सकती है। और ये भी हो सकता है कि जब ये पुस्तकें लिखी गईं उस समय की प्रजातियों को अपने कुछ पूर्वजों के बारे में तो पता हो, लेकिन उनका आरम्भ कहाँ से हुआ इसके बारे में न पता हो, तो उन्होनें एक व्यक्ति या एक ईश्वर की परिकल्पना की हो, जिससे सम्पूर्ण मानव जाति व सृष्टि की रचना हुई हो।
इस बात की भी सम्भावना है कि यहोवा और ब्रम्हा एक ही हों या एक ही विचार से प्रभावित हों। क्योंकि दोनों के बारे में मनुष्य की उत्पत्ति से सम्बन्धित व व्याभिचार की बातें हम पढ़ते हैं। मूसा और मनु के भी एक ही विचार से प्रभावित होने की सम्भावना लगती है।
वास्तविकता क्या थी इसका हम सिर्फ अंदाजा ही लगा सकते हैं। वास्तविकता जो कुछ भी रही हो पर इतना तो तय है कि ब्रम्हा देवो व देवियों व आर्यो के प्रथम पूर्वज थे।
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स्वर्ग क्या है?
परलोक की परिकल्पना तो दस हजार साल पहले हो गई थी। इसी से प्रेरित होकर सम्भवतः स्वर्ग की परिकल्पना मेसोपोटामिया की सभ्यसता में की गई थी। पर वहाँ स्वर्ग का बगीचा था, जो सम्भवतः मध्य एशिया के ढ़ेर सारे मरुस्थल के बीच बेबीलोन का एक छोटा सा प्राकृतिक छटाओं से भरपूर भाग हो। पर असली स्वर्ग सम्भवतः उन्हें हुंज वैली या कश्मीर में आकर मिला। जहाँ चारो तरफ प्राकृतिक छटा बिखरी हुई थी।
जिस स्वर्ग की परिकल्पना धर्मो ने की उसमें कोई भी ऐसी चीज नही बताई गई जो पृथ्वी पर न मिलती हो। वही चीजें वहाँ मौजूद हैं जो पृथ्वी पर हैं। इसका सीधा मतलब है कि स्वर्ग की परिकल्पना पृथ्वी के ही किसी भू-भाग से ली गई है।
स्वर्ग जो बादलों के पार हो, जहाँ सुन्दर अप्सराएं हों, जहाँ नदी-झरने-तालाब सब हों, जहाँ स्वादिष्ट खाने की कमी न हो, जहाँ प्रकृति अपनी सारी छटा बिखेरती हो। तो ऐसा स्थान कहाँ दिखाई देता है आपको? मुझे तो ऐसा स्थान कश्मीर की घाटी में दिखाई देता है। तो वास्तव में ये कश्मीर या हुंज और स्वात वैली के आसपास का क्षेत्र ही स्वर्ग था। वहाँ पर रहने वाले पुरुष देवता और स्त्रियाँ देवी कहलाई। और इनके राजा इन्द्र। क्योंकि ये स्थान बादलों के बीच में था, इसलिए उन्हें बादलों का देवता भी कहा गया। इन घाटियों के नीचे का स्थान जो भारत का मैदानी भाग था वो पृथ्वी कहलाया और जो उनके वंशज इन मैदानों में आकर बस गए वो आर्य कहलाए।
मैं एक बार कश्मीर गया और जब वायुमार्ग से वहाँ से वापस आ रहा था तो मुझे एक नदी दिखाई दी। सच जानिए बिल्कुल ऐसा लग रहा था जैसे नदी आकाश से निकल रही हो। धुंध में कहीं उसका ओर-छोर ही नही पता चल रहा था। एकदम ऐसा लग रहा था जैसे आकाश से निकल कर दूर से बहती हुई नदी पृथ्वी पर आ रही हो। तो किसी ने यदि गंगा को किसी पहाड़ की चोटी से ऐसे ही देखा होगा, तो उसने तो यही परिकल्पना उस युग में या उस समय में की होगी कि गंगा स्वर्ग से या आकाश से निकल कर आई हैं। कुछ दूसरे तथ्य रख रहा हूँ ।
गंगोत्री हिमालय में है। जिन्हें आप भगवान शंकर मानते हैं, उनका निवास स्थान आप कैलाश पर्वत मानते हैं, जो तिब्बत में है। उनका विवाह हिमालय की पुत्री पावर्ती से हुआ। हिमालय में बादल जमीन पर आ जाते हैं। हिमालय ऐसा लगता है कि वो बादलों में बसा देश है। बादल हिमालय पर ही तो रहते हैं और हमारे देवता इन्द्र वगैरह की परिकल्पना बादलों में ही की गई है। बादलों के पार आकाश में ही अपना स्वर्ग बताया गया है। हिमालय की ऊँचाई इतनी है कि वो आकाश तक या बादल तक पहुँच जाता है।
आज कई बिल्डिंग्स सैकड़ों मंजिल की ऐसी बन रही हैं कि ऊपर की मंजिल से नीचे बादलों के अलावा कुछ दिखाई नही देता। आज नई तकनीकों के कारण हम ये सब स्पष्ट रुप से देख सकते हैं, समझ सकते हैं। आज से पाँच हजार साल पहले क्या लोग इतना स्पष्ट रुप से देख व समझ सकते होगें? उन्हें तो जो समझ में आया, उसी पर कहानी बना ली।
स्वर्ग के पहले परलोक का सिद्धान्त आया, जो बहुत मुमकिन है आकाश व उसकी संरचना को देख कर आया होगा, और नाटूफियन सभ्यकता के लोगों ने दफनाना शुरु किया और उसके साथ कुछ सामान भी वो रखते थे। फिर पिरामिड भी इसका उदाहरण हैं। पिरामिड तो वैसे भी दुनिया के सबसे बड़े शवगृह या कब्रें हैं। लोगों को लगा कि व्यक्ति इस दुनिया को छोड़ कर दूसरी दुनिया में जाता है। क्योंकि उसे दूसरी दुनिया के रुप में चाँद, सूरज और तारे दिखाई दे रहे थे। तारे क्योंकि छोटे दिखाई दे रहे थें, तो ऐसी भी परिकल्पना की गई कि मनुष्य मृत्यु के बाद तारा बन जाता है और चांद और सूरज क्योंकि बड़े दिखाई दे रहे थे, इसलिए इन्हें ही ईश्वर मान लिया गया। इसके अलावा तो हमारे प्राचीनतम पूर्वजों के सामने कोई सच खुला नही था।
फिर लोगों ने जब तमाम बंजर जमीनों के बीच छोटा सा प्रकृति की छटाओं से भरा भू-भाग देखा होगा तो उसे ही स्वर्ग समझा होगा, जो बाद में समय और धर्मांधता के कारण दूसरी दुनिया का स्वर्ग बन गया।
स्वर्ग अगर सच जानिए तो कोई दूसरा लोक नही है। हिमालय के स्वात, हुंज व कश्मीर के भाग को ही पहले के लोग स्वर्ग समझते थे।
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देवी व देवता कौन थे?
आपने सुना होगा, आज भी भारत में स्त्रियाँ देवी शब्द अपने नाम के आगे लगाती हैं। जैसे सावित्री देवी, रमा देवी, इत्यादि। वास्तव में आर्यों के पूर्वज पुरुषों को देव व स्त्रियों को देवी कहते थे। जैसे आज हम सम्मान जनक शब्दों के रुप में श्रीमान या श्रीमती या जनाब कहते हैं, वैसे ही देव पुरुषों के लिए सम्बोधन वाचक शब्द था और देवी स्त्रियों के लिए। ऐसा इसलिए था, क्योंकि वो अपने जीवन का बलिदान अपने समाज, अपने परिवार को दुश्मन व जानवरों से बचाने के लिए करते थे। कालान्तर में उनके कार्य निम्न वर्ग के होते गए और भाषाएं बदलती गई। विदेशी आक्रमण का भी प्रभाव हुआ और देव शब्द पुरुषों के साथ से हट गया। अभी तक तो देवी शब्द स्त्रियों के साथ चला आ रहा है भारत में, क्योंकि कुछ एक स्त्रियाँ आज भी त्याग की प्रतिमूर्ति है, जो अपने लिए नही, बल्कि अपना अस्तित्व अपने परिवार के लिए मिटा देती हैं। पर जैसे-जैसे शिक्षा बढ़ेगी और स्त्रियाँ स्वयं के लिए जीने लगेंगी, त्याग की भावना छोड़ती चली जायेगीं। ये देवी शब्द उनके साथ से भी हटता चला जायेगा। आज स्वयं स्त्रियाँ देवी शब्द नही लगाती, भविष्य में ये पूरी तरह से समाप्त हो जायेगा।
मेसोपोटामिया की सभ्य,ता में अहुर व देव दो जातियाँ पाई जाती थीं। देव अहुरों के दुश्मन हुआ करते थे। इतिहासकार ये मानते हैं कि अहुरों से हारने के बाद देवों को मेसोपोटामिया से बाहर निकलना पड़ा हो और सम्भवतः इन सब के मुखिया अग्नि या वरुण हों। क्योंकि उस समय कोई बड़ी सेना नही होती होगी, तो या तो इनके साथ सभी देवी-देवता आगे बड़े और स्वात, हुंज व कश्मीर घाटी के आसपास आकर ब्रम्हा के वंशज इन्द्र के पास आकर बस गए। या अन्य लोग तो गुलाम बना लिए गए हों और इन्द्र, वरुण, अग्नि, अश्वनीकुमार इत्यादि अनेकों देवों को वहाँ से निकलना पड़ा हो और वो आकर हुंज, स्वात या कश्मीर के आस-पास जिसे देवों का निवास स्थान स्वर्ग भी माना जाता है, वहाँ बस गए हो और वहाँ नए वंश की शुरुआत की हो।
कभी आप आनलाइन चेक करें तो आप पायेगें कि भारतीय देवताओं और ग्रीस के देवताओं में भी बहुत ज्यादा समानता है। जैसे –
इन्द्र – Zeus
यम – Hades
सप्त ऋषी – Seven sisters
नारद – Hermes
कामदेव – Cupid
त्रिमूर्ति (ब्रम्हा विष्णु व महेश) – Zeus, Hades
and Poseidon

ये इस कारण हो सकता है कि दोनों सभ्य ताएं मेसोपोटामिया की सभ्य ता से ही बाहर निकली हैं। इसलिए ये एक दूसरे को प्रभावित करती हैं। या फिर दोनों सभ्यकताएं सम्पर्क में रहीं हो और कहाँनियों के माध्यम से ये बात एक दूसरी सभ्यमता में गई हो और वैसे ही देवता दूसरी सभ्य्ता में भी रच दिए गए हो।

हमने देवासुर संग्राम की अनेकों कहानियाँ सुनी हुई हैं। वो वास्तव में ईरानीय सभ्योता या मेसोपोटामिया की सभ्य ता के समय की बात है। जोराष्टि्रयन द्धारा जिनके देवता अहुरा-मजदा थे। जिन लोगों ने अकेमिनिड साम्राज्य की स्थापना की, जिसे ईरान का पहला साम्राज्य माना जाता है। उन्होनें देवों को हरा दिया और देव मेसोपोटामिया की सभ्योता जो पूरब में हुंज वैली के आसपास तक फैली हुई थे, उसी के पास आकर सिमट गए। अर्थात् यही जोराष्टि्रयन असुर या अहुर थे। इसलिए ही हमें ईरान की सभ्यषता से कई समानता वेदों में मिल जाती है और ईरान में इस्तेमाल हुए कई शब्द भी वेदों में मिल जाते हैं।
जो देव या आर्य थे, वो भी गोरे, तीखी नाक नक्श व लम्बे चौड़े डील-डौल के होते थे और जो मध्य एशिया के लोग हैं, उनकी कद-काठी, नयन-नक्श, रुप-रंग भी वैसी ही होती है। जबकि दक्षिण भारतीयों की कद काठी इनसे मेल नही खाती। इन्ही समानताओं के कारण ये भी माना जाता है कि पण्डित और मुसलमान एक ही प्रजाति के हैं।
ओल्ड टेस्टामेंट में भी हम पढ़ते हैं कि यहूदियों के १२ कबीले थे, जिसमें से एक कबीला कश्मीर में आकर बस गया। जो सम्भवतः देव कहलाए।
इन प्रमाणों से ये तो पक्का हो जाता है कि देवी- देवता प्राचीन काल के हमारे पूर्वज और राजा ही है, जो ईरान से आकर भारत में बस गए।

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